
श्री शीतला चालीसा माता शीतला को समर्पित एक भक्तिमय स्तुति है। हिंदू धर्म में माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली और आरोग्य प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है, विशेष रूप से चेचक जैसी बीमारियों से संरक्षण के लिए।
यह चालीसा सरल और लयबद्ध भाषा में रची गई है, जिससे यह सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए पाठ करने योग्य बनती है। इसे प्रायः शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी जैसे पर्वों पर श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ा जाता है।
शीतला माता कौन हैं? क्यों माना जाता है उन्हें रोगों की देवी
भारतीय सनातन परंपरा में अनेक देवी-देवताओं की पूजा प्रकृति, स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा से जुड़ी हुई है। उन्हीं में से एक अत्यंत पूजनीय देवी हैं शीतला माता। भारत के कई राज्यों—विशेषकर राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में—शीतला माता की पूजा बहुत श्रद्धा के साथ की जाती है।
हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथ स्कंद पुराण में शीतला देवी का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस पुराण के अनुसार शीतला माता का वाहन गर्दभ (गधा) है और वे अपने हाथों में चार विशेष वस्तुएँ धारण करती हैं:
- कलश
- सूप
- मार्जन (झाड़ू)
- नीम के पत्ते
इन सभी वस्तुओं का गहरा प्रतीकात्मक और चिकित्सीय महत्व बताया गया है।
शीतला माता के प्रतीकों का रहस्य: कलश, नीम और झाड़ू का महत्व
शीतला माता की प्रतिमा या चित्र में जो वस्तुएँ दिखाई देती हैं, वे केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं बल्कि स्वास्थ्य और रोग-निवारण से जुड़े संकेत भी माने जाते हैं।
कलश (जल का पात्र)
कलश में रखा शीतल जल रोगी को ठंडक और शांति देता है।
चेचक जैसे रोगों में शरीर में अत्यधिक गर्मी और जलन होती है, इसलिए ठंडा जल अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।
सूप (हवा करने का साधन)
पुराने समय में रोगी को आराम देने के लिए सूप से हवा की जाती थी।
यह रोगी को ठंडक देता था और बेचैनी कम करता था।
मार्जन (झाड़ू)
झाड़ू को रोगों को दूर करने का प्रतीक माना गया है।
लोक मान्यता के अनुसार इससे चेचक के फोड़े-फुंसियों के फटने और रोग समाप्त होने का संकेत माना जाता है।
नीम के पत्ते
नीम प्राचीन भारतीय चिकित्सा में एक शक्तिशाली औषधि माना गया है।
नीम के पत्ते संक्रमण को रोकते हैं और त्वचा रोगों में अत्यंत लाभकारी माने जाते हैं।
इसलिए शीतला माता के हाथों में नीम का होना रोगाणु नाशक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
शीतला माता का वाहन गर्दभ क्यों?
शीतला माता का वाहन गर्दभ (गधा) बताया गया है।
लोक मान्यता है कि गधे की लीद का लेप चेचक के दागों को कम करने में उपयोगी माना जाता था।
शीतला माता के साथ कौन-कौन से देवता रहते हैं?
शीतला माता अकेली नहीं होतीं, उनके साथ कई रोगों से जुड़े देवता और शक्तियाँ भी बताई गई हैं:
- ज्वरासुर – ज्वर (बुखार) का दैत्य
- ओलै चंडी बीबी – हैजा की देवी
- चौंसठ रोग – विभिन्न रोगों का समूह
- घेंटुकर्ण – त्वचा रोगों के देवता
- रक्तवती – रक्त संक्रमण की देवी
यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में रोगों को भी एक दैवी शक्ति के रूप में समझा जाता था।
लिरिक्स – श्री शीतला चालीसा
॥ दोहा ॥
जय-जय माता शीतला,तुमहिं धरै जो ध्यान ।
होय विमल शीतल हृदय,विकसै बुद्धि बलज्ञान ॥
॥ चालीसा ॥
जय-जय-जय शीतला भवानी ।
जय जग जननि सकल गुणखानी ॥ १ ॥
गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित ।
पूरण शरदचन्द्र समसाजित॥ २ ॥
विस्फोटक से जलत शरीरा ।
शीतल करत हरत सब पीरा॥ ३ ॥
मातु शीतला तव शुभनामा ।
सबके गाढ़े आवहिं कामा ॥ ४ ॥
शोकहरी शंकरी भवानी ।
बाल-प्राणरक्षी सुख दानी ॥ ५ ॥
शुचि मार्जनी कलश करराजै ।
मस्तक तेज सूर्य समराजै ॥ ६ ॥
चौसठ योगिन संग में गावैं ।
वीणा ताल मृदंग बजावै॥ ७ ॥
नृत्य नाथ भैरो दिखरावैं ।
सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥ ८ ॥
धन्य-धन्य धात्री महारानी।
सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥ ९ ॥
ज्वाला रूप महा बलकारी ।
दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥ १० ॥
घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत ।
रोग रूप धरि बालक भक्षत ॥ ११ ॥
हाहाकार मच्यो जगभारी ।
सक्यो न जब संकट टारी॥ १२ ॥
तब मैया धरि अद्भुत रूपा।
करमें लिये मार्जनी सूपा ॥ १३ ॥
विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो ।
मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो ॥ १४ ॥
बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा ।
मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा ॥ १५ ॥
अबनहिं मातु, काहुगृह जइहौं ।
जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहौं ॥ १६ ॥
भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं ।
विस्फोटक भयघोर नसइहैं ॥ १७ ॥
श्री शीतलहिं भजे कल्याना ।
वचन सत्य भाषे भगवाना ॥ १८ ॥
विस्फोटक भय जिहि गृह भाई ।
भजै देवि कहँ यही उपाई ॥ १९ ॥
कलश शीतला का सजवावै ।
द्विज से विधिवत पाठ करावै ॥ २० ॥
तुम्हीं शीतला, जग की माता ।
तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥ २१ ॥
तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी ।
नमो नमामि शीतले देवी ॥ २२ ॥
नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी।
नमो-नमो जगतारणि तरणी ॥ २३ ॥
नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी ।
दुखदारिद्रादिक कन्दिनी॥ २४ ॥
श्री शीतला, शेढ़ला, महला ।
रुणलीह्युणनी मातु मंदला ॥ २५ ॥
हो तुम दिगम्बर तनुधारी ।
शोभित पंचनाम असवारी ॥ २६ ॥
रासभ, खर बैशाख सुनन्दन ।
गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन ॥ २७ ॥
सुमिरत संग शीतला माई ।
जाहि सकल दुख दूर पराई ॥ २८ ॥
गलका, गलगन्डादि जुहोई ।
ताकर मंत्र न औषधि कोई॥ २९ ॥
एक मातु जी का आराधन ।
और नहिं कोई है साधन॥ ३० ॥
निश्चय मातु शरण जो आवै।
निर्भय मन इच्छित फल पावै॥ ३१ ॥
कोढ़ी, निर्मल काया धारै ।
अन्धा, दृग-निज दृष्टि निहारै ॥ ३२ ॥
वन्ध्या नारि पुत्र को पावै।
जन्म दरिद्र धनी होई जावै ॥ ३३ ॥
मातु शीतला के गुण गावत ।
लखा मूक को छन्द बनावत ॥ ३४ ॥
यामे कोई करै जनि शंका ।
जग मे मैया का ही डंका ॥ ३५ ॥
भनत रामसुन्दर प्रभुदासा ।
तट प्रयाग से पूरब पासा॥ ३६ ॥
पुरी तिवारी मोर निवासा ।
ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥ ३७ ॥
अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत ।
मातु कृपा कौ बाट निहारत॥ ३८ ॥
पड़ा क्षर तव आस लगाई।
रक्षा करहु शीतला माई ॥ ३९ ॥
॥ दोहा ॥
घट-घट वासी शीतला,शीतल प्रभा तुम्हार ।
शीतल छइयां में झुलई,मइया पलना डार ॥
शीतला माता की पूजा का महत्व
शीतला माता की पूजा विशेष रूप से चेचक, त्वचा रोग और संक्रामक रोगों से रक्षा के लिए की जाती रही है।
भारत में कई स्थानों पर शीतला सप्तमी या बसौड़ा के दिन माता की विशेष पूजा की जाती है।
इस दिन ठंडा भोजन चढ़ाया जाता है और माता से परिवार के स्वास्थ्य की कामना की जाती है।


