गोवर्धन डाकू की एक रोचक कथा : जब एक डाकू भगवान श्री कृष्ण को लूटने पंहुचा वृन्दावन

गोवर्धन डाकू की एक रोचक कथा : जब एक डाकू भगवान श्री कृष्ण को लूटने पंहुचा वृन्दावन

भक्तमाल ग्रंथ में वर्णित गोवर्धन डाकू की कथा भक्ति और आत्म-परिवर्तन का अद्भुत उदाहरण है। गोवर्धन, जो अपने समय का एक कुख्यात डाकू था, जब उसने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं के प्रसंग सुने, तो उसके मन में श्याम सुंदर के दिव्य आभूषण लूटने का संकल्प आया और वह वृंदावन की ओर चल पड़ा। यमुना तट पर पहुँचकर उसने देखा कि भगवान कृष्ण गोपबालकों के बीच अपने दिव्य स्वरूप में विराजमान हैं। वह उन्हें लूटने के लिए आगे बढ़ा, परंतु कृष्ण की मनमोहक मुस्कान और दिव्य लीलाओं ने उसके अहंकार को पल भर में भस्म कर दिया।

परशुराम जी की सलाह पर गोवर्धन ने भगवान कृष्ण को मक्खन और मिश्री का भोग लगाया। जैसे ही उसने प्रसाद ग्रहण किया, उसका हृदय शुद्ध हो गया। पश्चाताप से भरकर गोवर्धन ने अपने पापों के लिए क्षमा मांगी और श्रीकृष्ण के चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया। भगवान ने उसे अपने गोपसखाओं के समूह में स्थान दिया। आइए भक्तमाल की इस अनमोल कथा में प्रवेश करें, जो भक्ति की शक्ति और मनुष्य के अंतर में होने वाले दिव्य परिवर्तन को अत्यंत सुंदर रूप से दर्शाती है। यह कथा भक्तमाल की अमूल्य रत्न-सी कहानियों में से एक है।

चोरी और लूट के लिए कुख्यात डकैत गोवर्धन पीछा करने वाली भीड़ से बचने के लिए भक्तों की भीड़ में कथा सुनते हुए छिपा बैठा है।

जब गोवर्धन डाकू ने भगवान कृष्ण की लीलाओं को सुना

गोवर्धन नाम का एक डाकू था, जिसकी पहचान चोरी, डकैती और लूटपाट करने वाले खतरनाक अपराधी के रूप में होती थी। एक दिन, उसने कहीं लूटपाट की , परंतु उसका पीछा करने वाली भीड़ से बचने के लिए वह पास ही चल रही एक कथा में जा पहुंचा। वहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी, और वह स्वयं को छुपाने के लिए कथा सुनने बैठ गया।

यह कथा करमैती बाई के पिता श्री परशुराम जी महाराज सुना रहे थे। वे श्री ठाकुर जी की दशम स्कंध की कथा का वर्णन कर रहे थे, जिसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया। कथा के दौरान, उन्होंने भक्तों को उस अद्भुत पल की झलक दी, जब यशोदा मैया अपने लाड़ले कन्हैया का श्रृंगार कर रही थीं।

महाराज ने बड़े भावपूर्ण स्वर में कहा, “हमारे कन्हैया कितने मनोहर हैं। उनका सांवला-सलोना रूप, कमल जैसे नेत्र, सुंदर नासिका, चिबुक, और कुंचित केशराशि देखकर मन आनंदित हो उठता है। कन्हैया ने सोने का मुकुट धारण किया है, उनके कानों में मकराकृत कुंडल हैं, और शरीर पर स्वर्णाभूषण की शोभा है। ठाकुर जी का यह दिव्य स्वरूप मोहक है, और उन्हें देखते ही प्रेम उमड़ आता है।”

हाथ में तलवार लिए गोवर्धन महाराज से कथा में बताए गए बालक का पता पूछते हुए।

गोवर्धन डाकू ने लिया भगवान श्री कृष्ण को लूटने का प्रण

जैसे ही गोवर्धन डाकू ने सोने और गहनों का वर्णन सुना, उसका लालच जाग गया। कथा समाप्त होने के बाद, जब सभी लोग महाराज जी से आशीर्वाद लेने आए, तो वह सबसे अंत में रुका। महाराज ने सोचा, “यह व्यक्ति बड़ा धैर्यवान लग रहा है।” लेकिन जैसे ही सब चले गए, गोवर्धन तलवार लेकर महाराज के पास पहुँचा और बोला, “जिस बालक का तुमने अभी वर्णन किया, वह कहाँ रहता है? मुझे उसका पता बताओ।”

महाराज ने मुस्कराते हुए कहा, “क्यों पूछ रहे हो?” गोवर्धन ने जवाब दिया, “लूटना है उसे। लूटपाट हमारा खानदानी काम है।” परशुराम जी समझ गए कि यह भगवान की विशेष कृपा का संकेत है। परशुराम जी मुस्कुराए और बोले, “उसका नाम श्याम सुंदर है। वह वृंदावन, जिला मथुरा में रहता है। लेकिन सुन, उन्हें लूट पाना आसान नहीं है। वह तेरे पकड़ में नहीं आएगा। वह बहुत छलिया है। तेरी जितनी भी चतुराई हो, वह तुझसे आगे रहेगा।”

यह सुनकर गोवर्धन ने कहा, “महाराज जी, अब यह मेरी आन-बान का सवाल बन गया है।” उसने प्रतिज्ञा ली, “जब तक उसे लूट नहीं लूँगा, न पानी पीऊँगा, न भोजन करूँगा।” परशुराम जी ने कहा, “यदि वह गहने न उतारे तो थोड़ा माखन और मिश्री साथ ले जाना। शायद वह उसे देखकर पिघल जाए।” गोवर्धन ने उनकी बात मान ली और माखन-मिश्री बाँधकर वृंदावन की ओर निकल पड़ा।

गोवर्धन खंजर निकालकर भगवान श्री कृष्ण से आभूषण उतारने को कहता है, और भगवान मुस्कुराते रहते हैं।

गोवर्धन डाकू और श्री कृष्ण की अद्भुत मुलाकात

गोवर्धन वृंदावन पहुँच गया और श्याम सुंदर को ढूँढने लगा। ग्वाल-बालों से पूछने लगा, “श्याम सुंदर कहाँ हैं? जो स्वर्ण आभूषण और मोर मुकुट धारण करते हैं।” ग्वाल-बाल उसकी बात सुनकर हँसे और बोले, “वह तो द्वापर युग की बात है। अब कहाँ मिलेंगे?”

लेकिन गोवर्धन को विश्वास था कि कथा झूठ नहीं हो सकती। भूखा-प्यासा, थका-हारा, वह हताश होकर बैठ गया और मन ही मन प्रार्थना करने लगा, “हे ईश्वर, यदि आप सच में हैं और यदि पंडित जी ने जो कहा वह सत्य है, तो मुझे श्याम सुंदर से मिला दे।”

इतने में आवाज आई एक ग्वाला (ग्वारिया) की आवाज आई, “श्याम सुंदर! तुम्हारी गाय इधर जा रही है।” यह सुनकर गोवर्धन डाकू तुरंत उस दिशा में दौड़ा। गोवर्धन यमुना किनारे पहुंचा। वहां का वातावरण अचानक बदल गया। ऐसा लगा जैसे वह किसी और युग में पहुंच गया हो। सब कुछ दिव्य और अद्भुत था।

गोवर्धन ने देखा, गाएं चराते ग्वालों के बीच एक सुंदर बालक पीतांबर धारण किए, करधनी और मोर मुकुट पहने हुए, हाथ में लकुटी लिए खड़ा है। उनकी मुस्कान इतनी मधुर थी कि गोवर्धन कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गया।

लेकिन फिर उसने खंजर निकाला और कहा, “अपने सारे गहने उतारो। मैं तुम्हें लूटने आया हूँ।” भगवान मुस्कुराए और बोले, “तू मुझे लूटेगा?” गोवर्धन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा, “क्या तुम मुझसे डरते हो?” श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले, “मैं काल से भी नहीं डरता, तो तुमसे डरने का प्रश्न ही नहीं उठता। लेकिन तुम कौन हो?”

गोवर्धन ने गर्व से कहा, “क्या मेरा नाम नहीं सुना? मेरा नाम गोवर्धन डाकू है।” भगवान मुस्कुराते हुए बोले, “अरे, तू तो केवल गोवर्धन है, मैं तो गोवर्धनधारी हूँ।” जैसे-जैसे भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन से वार्ता कर रहे थे, वैसे-वैसे गोवर्धन का अहंकार और उसका बुरा स्वभाव धीरे-धीरे नष्ट होता जा रहा था।

गोवर्धन ने बहुत कोशिश की, लेकिन भगवान की लीला के आगे उसकी तलवार काम न आई। संघर्ष के बाद गोवर्धन को परशुराम जी की सलाह याद आई। हारकर उसने माखन-मिश्री भगवान को अर्पित की। भगवान ने माखन खाया और कहा, “अब तुम भी खाओ।” जैसे ही गोवर्धन ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया, उसके हृदय की सारी कालिमा मिट गई। उसका चित्त निर्मल हो गया और उसे भगवान का दिव्य स्वरूप दिखाई देने लगा।

गोवर्धन भगवान के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। उसने अपने कुकर्मों के लिए क्षमा माँगी। भगवान ने कहा, “गोवर्धन, अब तुम हमारे सखा हो।” उसी क्षण गोवर्धन का देह-त्याग हुआ और वह भगवान की ग्वाल मंडली में शामिल हो गया।