हास्य से भरा भक्त अढ़ैया जी का प्रसंग: कैसे उन्होंने प्रभु श्रीराम से बनवाया भोजन!

हास्य से भरा भक्त अढ़ैया जी का प्रसंग: कैसे उन्होंने प्रभु श्रीराम से बनवाया भोजन!

यह कथा हमें यह सिखाती है कि गुरु की आज्ञा का पालन करना कितना आवश्यक है। अढ़ैयाजी ने न तो मंत्रों का जप किया और न ही कोई विशेष पूजा-विधि अपनाई, फिर भी उन्होंने केवल गुरुदेव के निर्देशों का पालन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान श्रीराम का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ।

अढ़ैया का अनोखा नाम और जीवन संघर्ष

एक गांव में अढ़ैया नाम का एक बहुत ही सीधा-साधा युवक रहता था। अढ़ैया का मतलब होता है ढाई किलो। उसका नाम अढ़ैया इसलिए पड़ा क्योंकि उसका भोजन कम से कम ढाई किलो का होता था। माता-पिता के निधन के बाद उसे रोज़ ढाई किलो आटे की रोटी खिलाने वाला कोई नहीं बचा था। उनका परिवार था, लेकिन कोई काम-धंधा नहीं करते थे। उनकी खाने की आदत से परेशान होकर परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया और कहा, “हम इतना भोजन नहीं करा सकते। आप कहीं और जाएं, जहाँ आपका पेट भर सके।”

भूख और दुःख से पीड़ित अढ़ैया, संत समर्थ स्वामी श्री रामदास जी के आश्रम में नतमस्तक होकर अपनी व्यथा निवेदन करता हुआ।

आश्रम में शरण और स्वामी रामदास जी से भेंट

अढ़ैया दुखी मन से चल पड़े। भूख से परेशान होकर, वे एक दिन एक आश्रम पहुंचे और वहाँ काम मांगने लगे। वह महान संत समर्थ स्वामी श्री रामदास जी का आश्रम था, जो स्वयं हनुमान जी के अवतार माने जाते थे। अढ़ैया ने स्वामी जी को प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई।

स्वामी जी ने कहा, “यहाँ तो भंडारा चलता है, तुम्हारे खाने की व्यवस्था हो जाएगी। लेकिन, बदले में तुम्हें यहाँ सेवा करनी होगी।”

अढ़ैया ने निश्चिंत होकर कहा, “मुझे जो भी काम देंगे, मैं उसे सीखकर कर लूंगा।”

स्वामी जी ने सोचा और अढ़ैया को गाय चराने की जिम्मेदारी दे दी। उन्होंने उसे बताया कि वैष्णव परंपरा का पालन करते हुए, जब तुम गाय चराने जाओ, तो यहाँ से आटा और सब्ज़ी लेकर जाओ। जंगल में जाकर भोजन बनाना, पहले ठाकुर जी को भोग लगाना, फिर प्रसाद के रूप में खाना खाना। इस तरह से सेवा भी होगी और तुम्हारा भोजन भी सुनिश्चित रहेगा।

अढ़ैया जी ने विनम्रता से कहा, “मुझे तो भोग लगाना आता ही नहीं।”

स्वामी जी ने कहा, “कोई बात नहीं, जब भोग तैयार हो जाए, तो भगवान को बुला लेना। वो भोग लगा लेंगे, फिर तुम प्रसाद ग्रहण कर लेना।”

अढ़ैया जंगल से उपले इकट्ठा कर ढाई किलो आटे की रोटियाँ बनाता हुआ।

अढ़ैया जी का पहला भोग और भगवान के आगमन का इंतजार

पहले दिन, अढ़ैया जी ने जंगल में गोबर के उपले इकट्ठे किए और उन पर ढाई किलो आटे की बाटी बना ली। साथ में आलू का भरता भी तैयार किया। फिर उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव के ठाकुर, आइये, भोग लगाइए।”

जब कोई नहीं आया, तो अढ़ैया बेचैन हो गया। उसे भूख लग रही थी और राम जी के आने का इंतजार करते-करते धैर्य टूटने लगा। भोला मानस नहीं जानता था कि प्रभु साक्षात् सामने प्रकट नहीं होंगे। लेकिन गुरुजी की आज्ञा मानना जरूरी था।

थोड़ी देर बाद उसने प्रभु राम से कहा, “देखो प्रभु, अब मुझे समझ आ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने साधारण और रूखा-सूखा खाना बनाया है, जबकि आपको तो हमेशा अच्छे-अच्छे पकवान खाने की आदत है, इसलिए आप नहीं आए।”

जिस भगवान श्री राम को बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों की कठोर साधना भी नहीं बुला पाती, वो उस भोले भक्त की सच्ची पुकार सुनकर तुरंत वहां प्रकट हो गए।

आँखें खोलते ही अढ़ैया के सामने धनुष धारण किए हुए भगवान श्री राम प्रकट होते हैं।

अढ़ैया की पुकार पर भगवान श्री राम का प्रकट होना

अढ़ैया ने जब आँखें खोलीं, तो देखा कि धनुषधारी श्री राम उनके सामने खड़े हैं। अढ़ैया हैरानी से बोला, “आप कौन हैं?” भगवान मुस्कुराते हुए बोले, “लोग मुझे श्री राम कहते हैं। तुमने गुरुदेव के ठाकुर को बुलाया था, और तुम्हारे गुरुदेव के ठाकुर हम ही हैं, इसलिए हम आ गए।”

श्री राम ने कहा, “आलू के भरते की खुशबू बहुत अच्छी आ रही है, हम भी तुम्हारे साथ खाना खाएँगे।”

अढ़ैया चौंकते हुए बोला, “मुझे तो लगा था कि आपको सिर्फ भोग लगाना होता है, क्या आप सच में खाते हैं?”

श्री राम ने उत्तर दिया, “हम सभी का भोजन नहीं ग्रहण करते, लेकिन जब तुम जैसे सच्चे भक्त हमें पुकारते हैं, तो हम अवश्य खाते हैं।”

अढ़ैया जी बहुत भोले थे, उन्हें ज़्यादा कुछ पता नहीं था। जो भगवान बड़े-बड़े मुनियों के ध्यान में भी नहीं आते, वो उस भोले भक्त के एक बार बुलाने पर तुरंत आ गए। श्री राम ने अढ़ैया जी से कहा, “तुम आँख बंद करो, तब हम भोग ग्रहण करेंगे।”

अढ़ैया जी ने सोचा कि प्रभु बस एक-दो बाटी खाएँगे, लेकिन श्री राम ने सारा भोजन ग्रहण कर लिया। जब अढ़ैया ने आँखें खोलीं, तो हक्के-बक्के रह गए और बोले, “प्रभु, आज आप मुझे भूखा ही रखेंगे क्या?”

श्री राम ने मुस्कराते हुए कहा, “क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे गुरुदेव ने तुम्हें भोग लगाने के लिए क्यों कहा था? आज एकादशी है, इसलिए उन्होंने तुम्हें आटा देकर कहा कि तुम खुद पका के भोग लगाओ। अब से रोज़ तुम्हें आटा और सब्ज़ी मिलेगी, और तुम पकाकर हमें बुला लिया करना। हम आकर भोग ग्रहण करेंगे।”

अढ़ैया जी ने उत्सुकता से पूछा, “प्रभु, क्या आप रोज़ आएँगे?”

श्री राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर तुम रोज़ बुलाओगे, तो हम जरूर आएँगे।”

अगले दिन अढ़ैया जी आश्रम लौटे और गुरुजी से बोले, “आपके ठाकुर जी कल आए थे और सारी बाटी खा गए। अब से मैं पाँच किलो आटा ले जाऊँगा—ढाई किलो आपके ठाकुर जी के लिए और ढाई किलो मेरे लिए।”

गुरुजी को हँसी आ गई, और उन्होंने भंडारी से कहा, “जो भी ये माँगें, इन्हें दे दिया करो। पूछने की कोई ज़रूरत नहीं है।”

इस बार अढ़ैया ने आँखें खोलीं तो भगवान श्री राम के साथ माता सीता भी उपस्थित थीं।

श्री राम के संग माता सीता भी आईं इस बार

अगले दिन अढ़ैया जी गायों को चराने के लिए जंगल पहुंचे। गायों को छोड़ने के बाद उन्होंने फिर से बाटी और भरता बनाया। पत्तल में भोजन परोसकर आँखें बंद कीं और कहा, “गुरुदेव के ठाकुर, पधारिए।”

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो देखा कि इस बार श्री राम के साथ माता सीता भी आई थीं। अढ़ैया ने आश्चर्य से पूछा, “यह कौन हैं?”

श्री राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह मेरी अर्धांगिनी, सीता हैं।”

अढ़ैया जी ने भोलेपन से पूछा, “कल आपने क्यों नहीं बताया कि आपकी अर्धांगिनी भी हैं? क्या ये भी हमारे साथ भोजन करेंगी?”

श्री राम ने हंसते हुए कहा, “हाँ, यह भी मेरे जितना ही भोजन करती हैं।”

अढ़ैया जी ने भोग लगाते हुए कहा, “गुरुदेव के ठाकुर, भोग स्वीकार कीजिए।” और श्री राम और माता सीता ने मिलकर सारा भोजन ग्रहण कर लिया।

अढ़ैया जी आश्रम लौटकर गुरुदेव से बोले, “कल से हमें साढ़े सात किलो आटा चाहिए, क्योंकि आपके ठाकुर आज अपनी पत्नी को भी लेकर आए थे।” आश्रम के लोग उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे और सोचने लगे कि अढ़ैया जी शायद गायों को बाटी खिला देते होंगे। गुरुजी ने आदेश दिया कि अढ़ैया जी को साढ़े सात किलो आटा दे दिया जाए।”

इस बार भगवान श्री राम माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ प्रकट होते हैं।

श्री राम के साथ सीता और लक्ष्मण का आगमन

अगले दिन अढ़ैया जी को बाटी बनाते-बनाते दोपहर के तीन बज गए। पत्तल में भोजन परोसकर उन्होंने पुकारा, “गुरुदेव के ठाकुर, पधारिए।” इस बार श्री राम अपने साथ सीता जी और लक्ष्मण जी को लेकर आए थे।

अढ़ैया ने हैरानी से पूछा, “ये कौन हैं?”

श्री राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह हमारे छोटे भाई लक्ष्मण हैं।”

अढ़ैया ने मासूमियत से कहा, “पहले बता देते तो हम और व्यवस्था कर लेते।”

श्री राम ने हंसते हुए लक्ष्मण से कहा, “बहुत भोला भक्त है, नाराज मत होना।”

तीनों के चले जाने के बाद, अढ़ैया ने पत्तलों में जो जूठन बची थी, वह खाई। जैसे ही उन्होंने वह प्रसाद ग्रहण किया, उन्हें एक अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई।

अढ़ैया जी ने अगले दिन आश्रम से दस किलो आटा माँगा और बताया, “आज आपके ठाकुर जी के साथ एक गोरे-गोरे भाई भी आए थे।” गुरुजी हैरान थे कि इस भोले भक्त को श्री राम, सीता और लक्ष्मण का अनुभव कैसे हुआ। उन्होंने सोचा, भूख के मारे बावला हो गया है। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि यह सब सच है।

भगवान श्री राम के साथ गदा धारण किए हुए हनुमान जी भी उपस्थित होते हैं।

हनुमान जी का भी आगमन

अढ़ैया जी ने दस किलो आटा लेकर जंगल में जाकर बाटी बनाई और फिर पुकारा, “गुरुदेव के ठाकुर, पधारिए।” इस बार, श्री राम के साथ विशाल गदा लिए हनुमान जी भी आए थे।

अढ़ैया ने आश्चर्यचकित होकर श्री राम से पूछा, “ये कौन हैं?”

श्री राम ने कहा, “यह हमारे प्रिय सेवक, हनुमान जी हैं।”

अढ़ैया जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अगर आप हमें पहले ही बता देते कि कितने लोग होंगे, तो हम और अधिक व्यवस्था कर लेते।”

श्री राम ने हनुमान जी से कहा, “ग़ुस्सा मत होना, यह भक्त बहुत ही निराला है।”

फिर अढ़ैया ने सभी को कहा, “प्रसाद पाइए, प्रभु।” सभी ने प्रसाद का आनंद लिया और बचा हुआ भोजन हनुमान जी ने पूरी तरह से समाप्त कर दिया।

अढ़ैया जी आश्रम लौटे और गुरुदेव से कहा, “कल से पाँच किलो और आटा दे दीजिए। आज आपके प्रभु के एक विशाल सेवक भी साथ आए थे।

गुरुदेव को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्हें यह सोचकर रोमांच हुआ कि क्या प्रभु सच में इस भक्त पर इतनी कृपा कर रहे हैं? उन्होंने तय किया कि अगली बार अढ़ैया की परीक्षा ली जाएगी।

अढ़ैया पंद्रह किलो आटे की बाटी बनाकर गुरुदेव के ठाकुर को पुकारता है, इस बार श्री राम के साथ दो और लोग आते हैं।

श्री राम और उनके पूरे परिवार ने भक्त की सेवा स्वीकार की

अगले दिन, अढ़ैया ने पंद्रह किलो आटा लिया, बाटी बनाई और पुकारा, “गुरुदेव के ठाकुर, पधारिए।” इस बार श्री राम के साथ दो और लोग भी आए थे।

अढ़ैया ने उत्सुकता से श्री राम से पूछा, “ये दोनों कौन हैं?”

श्री राम ने मुस्कराते हुए कहा, “ये हमारे दो और भाई हैं—भरत और शत्रुघ्न।”

अढ़ैया सोचने लगे, “लगता है, आज भी भूखा रहना पड़ेगा।”

अढ़ैया जी ने सभी को प्रसन्नता के साथ भोजन कराया और खुद चुपचाप सबको देखने लगे। अनजाने में ही उनकी भी एकादशी पूरी हो गई।

अढ़ैया जी आश्रम लौटे और गुरुदेव से कहा, “कल से बीस किलो आटे की बोरी दे दीजिए। आपके इतने ठाकुर हैं, हम दिन भर उनके लिए भोग बनाएँगे।”

हनुमान जी लकड़ी और उपले लाते हैं, लक्ष्मण जी चूल्हा जलाते हैं और माता सीता स्वयं भोजन बनाती हैं।

भगवान ने भक्त के लिए स्वयं तैयार किया भोजन!

अगले दिन अढ़ैया जी जंगल में गए, सारा सामान रख दिया, लेकिन कुछ भी पकाया नहीं। फिर उन्होंने पुकारा, “गुरुदेव के ठाकुर, पधारिए।”

सारा राम दरबार वहाँ उपस्थित था। लेकिन देखा तो प्रसाद तैयार ही नहीं था। प्रभु ने अढ़ैया से पूछा, “आज तो कोई खुशबू नहीं आ रही, आपने कुछ बनाया क्यों नहीं?”

अढ़ैया जी ने सरलता से जवाब दिया, “मुझे खाना तो मिलना ही नहीं है, तो फिर क्यों बनाऊँ? प्रभु, आज आपके साथ आपकी पत्नी और सेवक भी हैं। इतने दिनों से आप हमारे हाथ का प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं, आज हम आपके हाथ का भोजन पाना चाहते हैं।”

प्रभु ने सीता जी की ओर देखा और कहा, “देखो, यह भक्त कितना अनोखा है।” सीता जी, जो अनंत सामर्थ्य और सभी शक्तियों की स्वामिनी हैं, ने मुस्कराते हुए कहा, “सत्य है, यह भक्त अद्वितीय है।”

अढ़ैया जी ने कहा, “प्रभु, मैंने न तो लकड़ी इकट्ठी की है और न ही उपला।कृपया अपने सेवकों से कहिए कि वे इन चीज़ों की व्यवस्था करें।”

श्री राम ने तुरंत आदेश दिया: हनुमान जी को लकड़ी और उपला इकट्ठा करने के लिए भेजा, लक्ष्मण जी को चूल्हा जलाने के लिए कहा, और सीता जी ने स्वयं भोजन तैयार करने का कार्य शुरू कर दिया।

सदैव भजन में लीन गुरुदेव को भगवान के दर्शन होते हैं और वहाँ संपूर्ण राम दरबार उपस्थित दिखाई देता है।

गुरुदेव ने प्रभु की दयालुता का अनोखा दर्शन किया!

अढ़ैया जी ने प्रभु से कहा, “आप भोजन तैयार कीजिए, मैं गायें इकट्ठा करके आता हूँ।” फिर वह तेजी से आश्रम की ओर भागे और गुरुदेव से बोले, “आज हमने आपके ठाकुर के पूरे परिवार को यहाँ बुला लिया है। सभी ठाकुर मिलकर रोटी और बाटी बना रहे हैं।गुरुदेव, आप भी चलिए, आप हमेशा संदेह करते थे, आज आप उनके हाथ का बना भोजन स्वयं ग्रहण कीजिए।”

गुरुदेव ने सोचा कि यह व्यक्ति पागल है। श्री राम, जो बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में भी नहीं आते, वह एक साधारण गवाँर के सामने कैसे आ सकते हैं, जिसका न तो कोई मंत्र जपना आता है और न ही ग्रंथ पढ़ना आता है? लेकिन उन्होंने तय किया कि भगवान की दयालुता पर संदेह नहीं करना चाहिए और चलकर देख लिया।

गुरुदेव, जो हमेशा भजन में लीन रहते थे, प्रभु के दर्शन के अधिकारी तो थे ही। जब वे वहाँ पहुँचे, तो देखा कि पूरा राम दरबार उपस्थित था। उन्होंने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आपकी यह लीला मेरी समझ से परे है।”

श्री राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “जो ज्ञानी भक्त हैं, मैं तर्क से भी उनके समझ में नहीं आता, और विद्वानों की विद्वता भी मुझे छू नहीं सकती। लेकिन जो सरल, निष्कपट और भोले होते हैं, उनके सामने मैं अपनी महिमा और दिव्यता को भूल जाता हूँ। देखो, तुम्हारे इस भोले भक्त के कहने पर हमारा पूरा परिवार उसकी सेवा में लगा हुआ है।”

इस प्रकार, एक सरल भक्त के आग्रह पर प्रभु ने रसोई भी बनाई। यह भक्ति की अद्भुत कथा लोकमान्यता पर आधारित है।