जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति – आरती लिरिक्स

जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति – आरती लिरिक्स

“जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति” भगवान गणेश की उपासना का एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। भगवान गणेश को समृद्धि का दाता और विघ्नों का नाश करने वाला माना जाता है।

सुखकर्ता दुःखहर्ता आरती भगवान गणेश की एक अत्यंत लोकप्रिय भक्ति आरती है, जो भक्तों के हृदय में विशेष स्थान रखती है। गणेश चतुर्थी, दीपावली या किसी भी शुभ अवसर पर इस आरती का गायन करने से सफलता, सुख और शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है।

भक्तों का विश्वास है कि इस पवित्र स्तोत्र का श्रद्धा और भाव से पाठ करने से जीवन में समृद्धि और सौहार्द का आगमन होता है। इसलिए आइए, भक्ति और श्रद्धा के साथ एकत्र होकर भगवान गणेश की आराधना करें और एक स्वर में गाएं—“जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति”।

लिरिक्स – जय देव जय देव जय मंगल मूर्ति

सुखकर्ता  दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची ।
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची ।
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची ।
कंठी झलके माल मुकताफळांची ।
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः,
कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥

रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा ।
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा ।
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा ।
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया ।
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः,
कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥

लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना ।
सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना ।
दास रामाचा वाट पाहे सदना ।
संकटी पावावे निर्वाणी, रक्षावे सुरवर वंदना ।
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय मंगल मूर्ति ।
दर्शनमात्रे मनः,
कामना पूर्ति
जय देव जय देव ॥

शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुखको ।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरिहरको ।
हाथ लिए गुड लड्डू सांई सुरवरको ।
महिमा कहे न जाय लागत हूं पादको ॥
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता
धन्य तुम्हारा दर्शन
मेरा मन रमता,
जय देव जय देव ॥

अष्टौ सिद्धि दासी संकटको बैरि ।
विघ्नविनाशन मंगल मूरत अधिकारी ।
कोटीसूरजप्रकाश ऐबी छबि तेरी ।
गंडस्थलमदमस्तक झूले शशिबिहारि ॥
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता
धन्य तुम्हारा दर्शन
मेरा मन रमता,
जय देव जय देव ॥

भावभगत से कोई शरणागत आवे ।
संतत संपत सबही भरपूर पावे ।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे ।
गोसावीनंदन निशिदिन गुन गावे ॥
जय देव जय देव..

जय देव जय देव,
जय जय श्री गणराज ।
विद्या सुखदाता
धन्य तुम्हारा दर्शन
मेरा मन रमता,
जय देव जय देव ॥