
करारविन्दे न पदारविन्दं एक अत्यंत सुंदर स्तोत्र है, जो भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य बाल स्वरूप का वर्णन करता है। यह भक्ति के सबसे सरल और मधुर रूप को दर्शाता है—भगवान को अपने ही बच्चे के रूप में प्रेम करना। यह स्तोत्र भक्तों को श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में डुबो देता है और हृदय में गहन प्रेम व भक्ति की भावना जागृत करता है।
इस स्तोत्र की रचना महान संत बिल्वमंगल (जिन्हें लीला शुक भी कहा जाता है) ने की थी। वे प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीकृष्ण कर्णामृत के रचयिता भी हैं। उनके जीवनकाल के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, किंतु माना जाता है कि वे दक्षिण भारत के निवासी थे। उन्होंने द्वारका की यात्रा की और अंततः वृंदावन में समाधि ली। कुछ परंपराएँ उन्हें आंध्र प्रदेश से जोड़ती हैं, जबकि केरल में वे बिल्वमंगलतु स्वामीयर के नाम से प्रसिद्ध हैं।
इस स्तोत्र का प्रथम श्लोक एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है—प्रलयकाल में विशाल जलराशि पर वटपत्र (बरगद के पत्ते) पर शयन करते हुए बालकृष्ण, जो अपने कमल जैसे हाथों से अपने छोटे चरण पकड़कर अंगूठा चूस रहे हैं। यह दिव्य दृश्य भक्तों के हृदय को प्रेम और भक्ति से भर देता है तथा भगवान की निष्कलंक बाल-लीला और सर्वशक्तिमत्ता दोनों को दर्शाता है।
आगे के श्लोकों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और चमत्कारों का वर्णन है—माखन चोरी की शरारतें, गोपियों के साथ उनके विनोदपूर्ण खेल और बाल्यावस्था में किए गए अद्भुत कार्य।
यह स्तोत्र केरल की परंपराओं और सांस्कृतिक तत्वों को भी प्रतिबिंबित करता है। इसमें बालकृष्ण के व्याघ्र नख (बाघ का नाखून) धारण करने का उल्लेख है, जो केरल की परंपरा में विशेष महत्व रखता है। इसके अतिरिक्त, केरल में अत्यंत पूजनीय बाल मुकुंदाष्टकम् का प्रथम श्लोक भी श्रीकृष्ण कर्णामृत से ही लिया गया है।
करारविन्दे न पदारविन्दम् केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि बालकृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम और भक्ति का मार्ग है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल सर्वशक्तिमान रूप में पूजनीय ही नहीं, बल्कि एक निष्पाप बालक के रूप में प्रेम करने योग्य भी हैं, जो निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
इस स्तोत्र का नित्य पाठ मन को शांति, आनंद और भक्ति से भर देता है तथा श्रीकृष्ण की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह भक्तों को शुद्ध, निस्वार्थ प्रेम की अनुभूति कराता है और भगवान से गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है।
लिरिक्स – करारविन्दे न पदारविन्दं (गोविन्द दामोदर स्तोत्रम्)
करारविन्दे न पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् ।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ।।१।।
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे! हे नाथ नारायण वासुदेव ।
जिह्वे! पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।२।।
विक्रेतुकामा किल गोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः ।
दध्यार्दिकं मोहवशादवोचद गोविन्द दामोदर माधवेति ।।३।।
गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगम् ।
पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।४।।
सुखं शयाना निलये निजेडपि नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः ।
ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।५।।
जिह्वे! सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।
समस्त भक्तार्ति विनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ।।६।।
सुखावसाने इदमेव सारं दुःखावसाने इदमेव ज्ञेयं ।
देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।७।।
श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो ।
जिह्वे! पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।८।।
जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परं वदामि ।
आवर्णयेथ मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ।।९।।
त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते ।
वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति ।।१०।।
श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो ।
जिह्वे! पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।११।।
गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव ।
जिह्वे! पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।१२।।


