गुरु-निष्ठ भक्त श्री खोजीजी महाराज (चतुरदासजी) की प्रेरणादायक कथा और जीवन चरित्र

गुरु-निष्ठ भक्त श्री खोजीजी महाराज (चतुरदासजी) की प्रेरणादायक कथा और जीवन चरित्र

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अनेक संतों और महात्माओं ने अपने जीवन के माध्यम से भक्ति, गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना का महत्व समझाया है। ऐसे ही एक प्रेरणादायक संत के रूप में श्री खोजीजी महाराज (चतुरदासजी) का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है।

यह कथा भक्तमाल ग्रंथ में वर्णित श्री खोजीजी महाराज के जीवन प्रसंगों पर आधारित है। उनका जीवन चरित्र केवल एक धार्मिक विवरण नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसमें गुरु के उपदेश को समझने की तीव्र इच्छा, संत संग का प्रभाव और हरिनाम के प्रति उनकी भक्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

इस लेख में उनके जीवन के प्रमुख प्रसंगों को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

खोजीजी महाराज कौन थे? जीवन परिचय और जन्म कथा

राजस्थान के नागौर जिले में स्थित पालड़ी गाँव… उसी पवित्र भूमि पर एक महान भक्त का जन्म हुआ — श्री खोजीजी महाराज।

उनका जन्म पारीक ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनका मूल नाम चतुरदास था, लेकिन दुनिया उन्हें इस नाम से नहीं जानती थी… सभी प्रेम से उन्हें “खोजीजी” कहकर पुकारते थे।

बचपन से ही उनमें वैराग्य की भावना थी। उन्हें संसार की सामान्य बातों, घर के कामकाज या व्यवहारिक विषयों में कोई रुचि नहीं थी।

उनका मन सदैव हरिनाम के स्मरण, भजन और संतों के संग में ही लीन रहता था। जहाँ भगवान की बातें होतीं, जहाँ कथा-कीर्तन होता — वहीं उन्हें सच्चा आनंद मिलता था।

इसी स्वभाव के कारण उनका अपने भाइयों के साथ विशेष मेल नहीं था, और कई बार वे उनकी उपेक्षा भी करते थे। लेकिन खोजीजी के लिए यह सब गौण था — क्योंकि उनके हृदय में केवल भगवान का ही निवास था।

सत्संग के दौरान पिताजी का देहांत और गंगायात्रा का दिव्य प्रसंग

एक बार गाँव में संतों की एक मंडली आई।

श्री खोजीजी को ऐसा लगा मानो उन्हें जीवन का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो… वे दिन-रात संतों के चरणों में ही रहने लगे। कथा, भजन और सत्संग ही उनका जीवन बन गया। वे घर बहुत कम जाते थे।

इसी समय उनके पिताजी का स्वास्थ्य भी कमजोर था…
लेकिन खोजीजी के लिए एक ही आधार था — “भगवान की इच्छा।”

और फिर देखिए भगवान की लीला…
कीर्तन के मध्य, हरिनाम के गूंजते स्वर के बीच ही उनके पिताजी ने शांतिपूर्वक देह त्याग दिया।

घर में शोक का वातावरण छा गया… भाई और परिवारजन विलाप करने लगे…

लेकिन खोजीजी महाराज शांत और स्थिर रहे…
उन्होंने सभी को प्रेमपूर्वक समझाया:

“पिताजी की आयु पूर्ण हो चुकी थी। यह तो एक दिन होना ही था…
परंतु कितना सौभाग्य है कि उन्होंने संतों के सान्निध्य में और हरिनाम के कीर्तन के बीच देह त्याग किया…
यह तो सीधे भगवद् धाम का मार्ग है — यह शोक का नहीं, आनंद का विषय है…”

कुछ अज्ञानी लोग कहने लगे:
“तुमने इन संतों को बुलाया, कथा-कीर्तन कराया… और पिताजी चले गए!”

खोजीजी मुस्कुराकर बोले:
“यह दुख नहीं, यह संतों की कृपा है… जो संतों के संग में प्राण त्यागता है, उसका कल्याण निश्चित है…”

अंतिम संस्कार के बाद, भाइयों ने कहा:
“अब पिताजी की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करना होगा।”

गंगाजी बहुत दूर थीं…
और मानो जानबूझकर यह कठिन कार्य खोजीजी को सौंप दिया गया।

खोजीजी मुस्कुराकर बोले:

“जहाँ वैष्णव हरिनाम का स्मरण करते हैं,
वहीं गंगाजी सहित सभी तीर्थ स्वयं प्रकट हो जाते हैं…”

लेकिन भाइयों को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।
उन्हें लगा — “यह तो मेहनत से बचने का बहाना है।”

तब संतों ने समझाया:
“विवाद मत करो। परिवार की इच्छा के लिए जो आवश्यक हो, वह कर लो।”

अंततः श्री खोजीजी महाराज ने अपने सिर पर पिताजी का अस्थिकलश उठाया और हरिनाम संकीर्तन करते हुए गंगाजी की ओर चल पड़े…

मार्ग में एक अद्भुत घटना घटी…

उन्होंने कुछ दिव्य स्त्रियों को देखा, जिनके हाथों में स्वर्ण कलश थे।
उन्होंने पूछा:

“हे भक्तवर! आप कहाँ जा रहे हैं?”

खोजीजी ने विनम्रता से कहा:
“मैं पिताजी की अस्थियों को गंगाजी में विसर्जित करने जा रहा हूँ।”

वे दिव्य स्त्रियाँ मुस्कुराकर बोलीं:

“हम ही गंगा, यमुना और अन्य तीर्थ नदियाँ हैं…
हम आपके लिए ही यहाँ प्रकट हुई हैं।
आप यहीं अस्थि विसर्जन कर सकते हैं और स्नान करके लौट जाएँ।”

यह सुनकर खोजीजी का हृदय भक्ति से भर गया… उन्होंने वहीं अस्थि विसर्जन किया और पवित्र स्नान किया।

बाद में भाइयों को विश्वास दिलाने के लिए वे एक कलश में वह पवित्र जल भी साथ ले आए।

चतुरदास को “खोजीजी” नाम कैसे मिला?

श्री खोजीजी महाराज का मूल नाम चतुरदास था…
लेकिन वे “खोजीजी” के नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए — इसके पीछे एक अत्यंत सुंदर और आध्यात्मिक कथा जुड़ी हुई है।

एक दिन उनके गुरुदेव बाहर लघुशंका के लिए गए थे।
चतुरदासजी सेवा भाव से जल लेकर उनकी प्रतीक्षा में खड़े रहे…

जब गुरुदेव वापस आए, तो वे हल्के से मुस्कुराने लगे…

चतुरदासजी ने विनम्रतापूर्वक पूछा:
“गुरुदेव! आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं? क्या मुझसे कोई भूल हो गई है?”

गुरुदेव बोले:
“अरे! तू कैसा शिष्य है? गुरु के मन का भाव भी नहीं जानता?
जा… जब मेरे मन का भाव जान ले, तब वापस आना…”

यह आज्ञा सुनकर चतुरदासजी तुरंत गुरु के चरणों में प्रणाम करके निकल पड़े…

अब उनके मन में केवल एक ही प्रश्न था:
“मेरे गुरुदेव क्यों हंसे?”

जहाँ-जहाँ उन्हें संत-महात्मा मिलते, वे दंडवत करके यही प्रश्न पूछते…

लेकिन हर जगह उन्हें एक ही उत्तर मिलता:
“गीता, भागवत, वेदों की बात पूछो…
पर तुम्हारे गुरु क्यों हंसे — यह हमें कैसे पता?”

कई लोग तो उनके इस प्रश्न पर हंसते भी थे…
परंतु चतुरदासजी के लिए यह केवल प्रश्न नहीं था —
यह उनके जीवन का ध्येय बन गया था…

समय बीतता गया…
पर उन्हें कहीं से भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला…

वे भीतर से व्याकुल रहने लगे…
उन्हें लगा:
“मैं गुरु के मन का भाव समझ नहीं पाया…
और इसलिए मैं उनकी सेवा से वंचित रह गया…”

यह विचार उनके हृदय को दिन-रात जलाता रहा…

अंततः उन्होंने एक कठोर संकल्प लिया:

“यदि मैं गुरु के मन का भाव नहीं समझ सकता,
तो इस शरीर का क्या उपयोग?”

यह सोचकर उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया…
और एकांत स्थान पर बैठकर गुरु प्रदत्त नाम का जप करने लगे…

धीरे-धीरे वे ध्यान में लीन हो गए…
और उनकी चेतना अंतर्मुख हो गई…

अब उनके हृदय में केवल एक ही तड़प थी —
“गुरु के भाव को अनुभव करना…”

उसी समय उनकी समाधि में एक दिव्य दर्शन हुआ…
महान संत कबीरदासजी उनके सामने प्रकट हुए…

चतुरदासजी ने उन्हें पहचानकर दंडवत प्रणाम किया…

कबीरदासजी ने प्रेम से पूछा:
“बेटा, तू यहाँ एकांत में अन्न-जल त्यागकर क्यों बैठा है?”

चतुरदासजी की आँखों से आँसू बहने लगे…
उन्होंने कहा:
“महाराज! मैंने सब से पूछा… पर किसी ने उत्तर नहीं दिया…
मेरे गुरुदेव क्यों हंसे — यह मुझे जानना है…”

तब कबीरदासजी ने समझाया:

“जब तेरे गुरुदेव वहाँ थे,
पास में एक पीपल का वृक्ष था…

उसके छोटे-छोटे फल, पत्ते और बीज
बहाव में बह रहे थे…

इसे देखकर तेरे गुरुदेव के मन में एक गहरा विचार आया…”

“जब तक वे वृक्ष से जुड़े थे,
तब तक सुरक्षित और सुंदर थे…

लेकिन जैसे ही अलग हुए,
वे बहने लगे और नष्ट होने लगे…

इसी प्रकार जीवात्मा है…

जब तक वह परमात्मा से जुड़ा रहता है,
तब तक सुखी, शांत और निर्भय रहता है…

लेकिन जब वह भगवान से विमुख होता है,
तो संसार के प्रवाह में बहता रहता है…

और अज्ञानवश स्वयं को श्रेष्ठ मानता है…”

“इसी विचार से तेरे गुरुदेव को हँसी आई थी…”

यह सुनकर चतुरदासजी के हृदय में प्रकाश हो गया…
उनकी सारी व्याकुलता समाप्त हो गई…

अब उन्हें गुरु का भाव और जीवन का सच्चा अर्थ समझ में आ गया…

वे तुरंत अपने गुरुदेव के पास लौटे और सब कुछ बताया…

गुरुदेव बहुत प्रसन्न हुए…
आशीर्वाद देते हुए बोले:

“अब तू मेरे भाव को समझ गया है…
तूने सच्ची खोज की है…

आज से तू ‘चतुरदास’ नहीं,
बल्कि ‘खोजी’ कहलाएगा…”

आम के पेड़ के नीचे विश्राम करते संत खोजीजी महाराज की पेंटिंग, हाथ में कटा हुआ आम और जपमाला लिए, आसपास भक्तों के साथ और पीछे मंदिर का दृश्य।

खोजीजी महाराज के गुरुदेव की मुक्ति और घंटी का चमत्कारी प्रसंग

श्री खोजीजी महाराज के गुरुदेव अत्यंत उच्च कोटि के संत थे।
उनका मन सदैव भगवान के चिंतन में लीन रहता था…

एक दिन उन्हें अपने अंतिम समय का आभास हुआ…
तब उन्होंने एक विशेष उपाय किया…

उन्होंने अपने शरीर के पास एक घंटी बांध दी और शिष्यों से कहा:

“जब मुझे प्रभु प्राप्ति होगी, तब यह घंटी अपने आप बजेगी… और वही मेरी मुक्ति का प्रमाण होगा…”

समय आया…
गुरुदेव ने शांतिपूर्वक देह त्याग किया…

लेकिन आश्चर्य!
घंटी नहीं बजी…

शिष्य चिंतित हो गए…
“क्या गुरुदेव को अभी प्रभु प्राप्ति नहीं हुई?”

उनके मन में शंका और व्याकुलता बढ़ने लगी…

उसी समय खोजीजी महाराज बाहर यात्रा पर गए हुए थे…
जब वे लौटे और शिष्यों को उदास देखा, तो कारण पूछा…

शिष्यों ने पूरा प्रसंग बता दिया…

खोजीजी ने शांत स्वर में पूछा:
“गुरुदेव ने कहाँ शरीर त्याग किया था?”

शिष्यों ने बताया:
“एक आम के पेड़ के नीचे…”

खोजीजी महाराज तुरंत वहाँ पहुँचे…
और उसी स्थान पर जमीन पर लेट गए…

उन्होंने ऊपर देखा…
वहाँ एक पका हुआ आम लटका हुआ था…

खोजीजी ने तुरंत वह आम लिया
और उसे दो टुकड़ों में काट दिया…

जैसे ही आम काटा,
उसमें से एक छोटा कीड़ा बाहर निकला…

और सबके सामने ही
वह कीड़ा अदृश्य हो गया…

उसी क्षण…
घंटी अपने आप बज उठी…

सभी शिष्य आश्चर्यचकित रह गए…

खोजीजी महाराज ने इसका रहस्य समझाया:

“हमारे गुरुदेव पहले से ही प्रभु प्राप्त संत थे…
लेकिन शरीर त्याग के समय उनकी दृष्टि इस पके आम पर पड़ गई…

एक क्षण के लिए उनका मन उसमें लग गया…
और इसलिए उन्हें कीड़े के रूप में जन्म लेना पड़ा…”

फिर उन्होंने आगे कहा:

“लेकिन उनके मन में एक दिव्य भाव भी था —
कि यह पका हुआ फल भगवान को अर्पित होना चाहिए…

इस भाव को पूर्ण करने के लिए
भगवान स्वयं उस कीड़े में प्रविष्ट हुए…

और जब आज उस कीड़े का अंत हुआ,
तो भगवान उसे अपने साथ लेकर गुरुदेव में लीन हो गए…

इसी कारण अब घंटी बजी है…”

यह सुनकर सभी शिष्य भावविभोर हो गए…

उन्हें समझ में आया —
अंत समय में मन जहाँ जाता है, उसका गहरा प्रभाव होता है।
लेकिन यदि भाव भगवान के लिए हो, तो भगवान स्वयं उसे पूर्ण करते हैं।

श्री खोजीजी महाराज के जीवन में
संतनिष्ठा और गुरु भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है…

उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन
संत सेवा, गुरु भक्ति और भगवान के भजन में समर्पित कर दिया…

खोजीजी महाराज की तपोभूमि: खोजीजी की पालड़ी कैसे बनी कांदावाली पालड़ी?

राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में “पालड़ी” नाम के कई गांव थे और आज भी हैं। उनमें से एक गांव श्री खोजीजी महाराज की तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध था, जिसे “खोजीजी वाली पालड़ी” कहा जाता था।

कहा जाता है कि एक बार खोजीजी महाराज के आश्रम में एक कांदा (प्याज) उग आया, जो धीरे-धीरे बहुत बड़ा हो गया। खोजीजी महाराज प्रतिदिन पुष्कर स्नान करने जाते थे और लौटते समय पानी से भरा मटका भी साथ लाते थे।

उस कांदे की बढ़ती हुई वृद्धि देखकर वे प्रसन्न होते और बचा हुआ पानी उसमें डाल देते। कहा जाता है कि वे स्वयं कम पानी पीते और बाकी पानी उस कांदे को अर्पित करते।

इस प्रकार वह कांदा इतना बड़ा हो गया कि उसका वजन लगभग सवा मन (करीब 50 किलो) हो गया।

बाद में शिष्यों की सलाह से यह तय हुआ कि इस बड़े कांदे को जोधपुर दरबार में भेंट किया जाए, जिससे राजा प्रसन्न होकर कोई पुरस्कार दे सके।

जब वह कांदा दरबार में प्रस्तुत किया गया, तो राजा आश्चर्यचकित हो गया और पूछा कि इतना बड़ा कांदा कहाँ उगा?
तब उत्तर मिला — “खोजीजी वाली पालड़ी में।”

यह सुनकर राजा ने आदेश दिया कि उस भूमि को राज्य के अधीन ले लिया जाए और वहाँ कांदे की खेती की जाए।

इसके बाद वहाँ बड़े पैमाने पर कांदे की खेती होने लगी और उत्तम उत्पादन होने लगा। धीरे-धीरे वह स्थान “खोजीजी वाली पालड़ी” के स्थान पर “कांदावाली पालड़ी” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

इस परिवर्तन से खोजीजी महाराज का नाम उस स्थान से कम जुड़ गया — जिसे एक प्रकार से दुःखद माना जाता है।

इस प्रसंग से एक कहावत भी प्रचलित हुई:

हाथ बिगाड़े काम सब,किसको दिजे दोष, |
खोजाजी की पालड़ी लिवी प्याज ने कोष ||

खोजीजी महाराज के शिष्यों में रानाबाई का विशेष स्थान

खोजीजी महाराज के शिष्यों में संत रानाबाई का नाम विशेष आदर से लिया जाता है, जिन्हें “राजस्थान की दूसरी मीरा” के रूप में जाना जाता है।