
नवरात्रि के सातवें दिन हम देवी दुर्गा के सबसे शक्तिशाली रूपों में से एक माँ कालरात्रि की आराधना करते हैं। उनके गहरे काले स्वरूप और उग्र व्यक्तित्व में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक छिपा है। माँ कालरात्रि की कथा साहस और पराक्रम से भरी हुई है, जिसमें वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए राक्षसों से वीरतापूर्वक युद्ध करती हैं।
यद्यपि उनका स्वरूप भयावह प्रतीत होता है, लेकिन उनका हृदय करुणा और ममता से परिपूर्ण है। भक्तों का विश्वास है कि माँ कालरात्रि की उपस्थिति जीवन में शांति, साहस और सुरक्षा की भावना प्रदान करती है, जिससे भय और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। माँ कालरात्रि गधे पर सवार होकर तलवार धारण करती हैं, जो नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध उनके संघर्ष का प्रतीक है। उनकी कृपा से भक्तों का जीवन प्रकाशमय होता है और वे अंधकार व अनिश्चितता से बाहर निकलने का मार्ग प्राप्त करते हैं।
माँ दुर्गा का शक्तिशाली रूप: कालरात्रि का अवतार
माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति, जिसे हम कालरात्रि के नाम से जानते हैं, की पूजा दुर्गा पूजा के सातवें दिन की जाती है। माँ कालरात्रि को देवी काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्यू-रुद्राणी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। इसके अलावा, रौद्री और धूम्रवर्णा जैसे नाम भी हैं, जो उनकी विभिन्न शक्तियों को दर्शाते हैं।
माँ कालरात्रि दुष्टों और बुरी शक्तियों का नाश करने वाली देवी हैं। उनके नाम का स्मरण मात्र ही दानवों, राक्षसों, भूत-प्रेतों और नकारात्मक शक्तियों को भयभीत कर दूर कर देता है। वे ग्रह-बाधाओं को समाप्त करती हैं और अपने भक्तों को हर प्रकार के भय से मुक्ति दिलाती हैं। चाहे अग्नि का डर हो, जल का, शत्रुओं का या रात्रि का—माँ कालरात्रि की कृपा से उनके उपासक इन सभी प्रकार के भय से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं।
माँ कालरात्रि शुभंकारी देवी हैं, उनकी उपासना से मिलने वाले आशीर्वाद अनगिनत होते हैं। इसलिए हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करते रहना चाहिए ताकि हम उनकी कृपा से सदैव भय-मुक्त और सुरक्षित रहें।
माँ कालरात्रि के अन्य नाम
माँ कालरात्रि का रूप देखने में अत्यंत भयंकर है, परंतु वे हमेशा अपने भक्तों को शुभ फल ही प्रदान करती हैं, इसलिए उन्हें ‘शुभंकारी’ कहा जाता है। देवी कालरात्रि को देवी काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्यु-रुद्राणी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के विनाशकारी रूपों में गिना जाता है। इनके अन्य नामों में रौद्री और धूम्रवर्णा जैसे कम प्रचलित नाम भी शामिल हैं।
माँ कालरात्रि का दिव्य स्वरूप
माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में बेहद भयानक है, लेकिन वे हमेशा शुभ फल देने वाली मानी जाती हैं। उनका रंग गहरे अंधकार की तरह काला है, और उनके बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकती हुई माला है। माँ के तीन नेत्र हैं, जो गोल और विशाल हैं, जैसे पूरा ब्रह्मांड उनमें समाया हो। इन नेत्रों से निरंतर बिजली जैसी चमकती किरणें फूटती रहती हैं । उनकी नासिका से जब भी वे श्वास लेती हैं, अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती हैं। माँ का वक्षस्थल पर्वत के समान शक्तिशाली और दृढ़ है, जिससे वे असुरों को धक्का देकर उनका नाश करती हैं। उनका वाहन गर्दभ (गधा) है।
माँ का दाहिना हाथ वरमुद्रा में उठा हुआ है, जिससे वे अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं, जबकि दाहिने हाथ का नीचे वाला हिस्सा अभयमुद्रा में है, जो भक्तों को निडरता का आशीर्वाद देती है। उनके बाएँ हाथ में ऊपर की ओर लोहे का काँटा है, और नीचे वाले बाएँ हाथ में एक खड्ग(कटार) है।
माँ कालरात्रि का यह रूप न केवल उग्रता और विनाश का प्रतीक है, बल्कि उनके भीतर छिपी असीम करुणा और भक्तों की रक्षा के लिए अदम्य साहस का भी प्रतीक है।
माँ कालरात्रि की उत्पत्ति की कथा: कैसे माँ कालरात्रि ने किया रक्तबीज का विनाश
पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों पर अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया था। उनके इस अत्याचार से देवता बहुत परेशान हो गए और भगवान शिव से मदद मांगने पहुंचे। रक्तबीज के पास एक अद्भुत वरदान था कि अगर उसके शरीर से कोई भी रक्त की बूंद गिरती, तो उससे कई नए रक्तबीज उत्पन्न हो जाते। इससे उसका अंत करना लगभग असंभव हो गया था, क्योंकि हर वार के साथ उसकी सेना बढ़ती जा रही थी।
यह देख सभी देवता बहुत चिंतित हो गए। तब भगवान शिव ने देवी पार्वती से अनुरोध किया कि वे इस समस्या का समाधान करें और दैत्यों का नाश करके अपने भक्तों की रक्षा करें। भगवान शिव की आज्ञा से देवी पार्वती ने माँ दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया। लेकिन जब उन्होंने रक्तबीज से युद्ध किया और उसे घायल किया, तो उसकी रक्त की हर बूंद से हजारों नए रक्तबीज पैदा होने लगे। यह देखकर देवी दुर्गा भी असमंजस में पड़ गईं।
इस कठिनाई को देखकर देवी दुर्गा ने अपने भयंकर रूप में प्रकट होकर माँ कालरात्रि का अवतार लिया। माँ कालरात्रि का रूप बहुत ही उग्र और भयानक था। उनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह काला था, उनके बाल बिखरे हुए थे, और उनकी तीन आँखों से बिजली जैसी किरणें निकल रही थीं। माँ कालरात्रि ने रक्तबीज को न केवल मारा, बल्कि उसके शरीर से बहने वाले रक्त को अपने मुख में समाहित कर लिया, ताकि एक भी रक्त की बूंद धरती पर न गिर सके और कोई नया रक्तबीज उत्पन्न न हो। इस प्रकार, माँ कालरात्रि ने रक्तबीज का संहार कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कर दिया।
नवरात्रि के सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विशेष महत्व है। इस दिन उनकी पूजा-अर्चना करने से सारे पापों से मुक्ति मिलती है और शत्रुओं का नाश होता है। इसके साथ ही व्यक्ति का तेज और आत्मबल भी बढ़ता है। माँ कालरात्रि की कृपा पाने के लिए हर व्यक्ति सरल और सुलभ तरीके से उनकी आराधना कर सकता है।
माँ कालरात्रि का पसंदीदा रंग
माँ कालरात्रि को नीला और काला रंग बहुत प्रिय है। नवरात्रि के महासप्तमी के दिन देवी कालरात्रि की पूजा करते समय नीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। यह रंग न केवल माँ को प्रिय है, बल्कि निर्भयता और आत्मविश्वास का प्रतीक भी है।
माँ कालरात्रि को कौन सा भोग लगाएं?
माँ कालरात्रि को गुड़ बहुत पसंद है। नवरात्रि के सातवें दिन मां को गुड़ का भोग लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यह मान्यता है कि इस दिन गुड़ अर्पित करने से मां की कृपा से जीवन में सुख और समृद्धि का संचार होता है।
माँ कालरात्रि का मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


