माँ शैलपुत्री – नवरात्रि की प्रथम देवी की पावन कथा

माँ शैलपुत्री - नवरात्रि की प्रथम देवी की पावन कथा

शारदीय नवरात्रि के पहले दिन, माता शैलपुत्री, नवदुर्गा का पहला स्वरूप, पूजा जाती हैं। पर्वतों के राजा हिमालय की पुत्री होने के कारण उन्हें ‘शैलपुत्री’ कहा जाता है, और उन्हें उमा, सती, और हेमावती नामों से भी जाना जाता है। माता शैलपुत्री बैल पर सवार होती हैं, उनके माथे पर चंद्रमा का अर्धचंद्र है, और उनका प्रिय रंग सफेद है।

इस दिन भक्त सफेद वस्त्र पहनते हैं और देवी को सफेद फूल, खीर और चावल अर्पित करते हैं। माना जाता है कि माता शैलपुत्री की भक्ति भाव से पूजा करने से जीवन में शांति, समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है। पूजा के बाद उनके मंत्रों का जप, आरती करना और उनकी कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए माता शैलपुत्री की कथा जानें…

माँ शैलपुत्री: देवी दुर्गा के शक्तिशाली रूपों में से एक

नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। नवरात्रि के पहले तीन दिनों में देवी पार्वती की पूजा की जाती है, जो शक्ति, साहस और समर्पण का प्रतीक हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा से आरंभ होती है, जो नवदुर्गाओं में सबसे पहले पूजी जाने वाली देवी हैं। शैलपुत्री का अर्थ है ‘पर्वतों की पुत्री’। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इन्हें यह नाम मिला।

मां शैलपुत्री की उपासना से साधक को शक्ति, साहस और स्थिरता प्राप्त होती है। नवरात्रि के पहले दिन इनकी पूजा विशेष रूप से की जाती है, जिससे साधक के सभी कष्टों और पापों का नाश होता है।

माँ शैलपुत्री के विविध नाम और उनकी महिमा

मां शैलपुत्री को सती, पार्वती, भवानी, और हेमावती के नाम से भी जाना जाता है। उनका वाहन वृषभ (बैल) है, इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। वह सती के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने अपने पहले जन्म में भगवान शिव से प्रेम किया और विवाह किया था। हालांकि, अपने पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान के कारण उन्होंने आत्मदाह कर लिया। इस जन्म में वह पार्वती के रूप में पुनः जन्मीं और पुनः भगवान शिव से विवाह किया।

माँ शैलपुत्री का दिव्य स्वरूप

मां शैलपुत्री ब्रह्मा, विष्णु और शिव की शक्ति का प्रतीक हैं। मां शैलपुत्री की छवि अत्यंत आनंदमयी और सौम्य है, उनके माथे पर अर्धचंद्र विराजमान है जो उनकी दिव्यता का प्रतीक है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल है, जो उनकी अदम्य शक्ति और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है, जबकि बाएं हाथ में कमल है, जो उनकी सौम्यता और करुणा का प्रतीक है। वह अपने वाहन वृषभ (बैल) पर सवार हैं, जो उनकी स्थिरता और धैर्य का प्रतीक माना जाता है।

माँ शैलपुत्री की कथा: उत्पत्ति और महिमा

दक्ष प्रजापति की 60 कन्याएं थीं, जिनमें से सती नामक कन्या का विवाह दक्ष की इच्छा के विरुद्ध, भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ था। एक बार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी राजधानी कनखल में एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने न तो भगवान शिव को आमंत्रित किया और न ही अपनी पुत्री सती को।

यज्ञ के दौरान, सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव का नाम तक नहीं लिया गया। सती को यह जानकर बहुत दुख हुआ कि उनके पति को अनदेखा कर दिया गया। सती ने भगवान शिव से यज्ञ में जाने की इच्छा जताई, लेकिन शिव ने उन्हें समझाया कि उन्हें निमंत्रण नहीं मिला है और इस वजह से वहां जाना ठीक नहीं है। फिर भी, सती की इच्छा के आगे शिव ने उन्हें अनुमति दे दी।

जब सती यज्ञ स्थल पर पहुंचीं, तो उन्हें अपनी मां का स्नेह तो मिला, लेकिन बहनों की बातों में तिरस्कार और उपहास के भाव थे। दक्ष ने भी भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहे, जिससे सती का दिल टूट गया। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।

उन्होंने यह अपमान सहन नहीं किया और योगाग्नि में आत्मदाह करने का निर्णय लिया। भगवान शिव को जब इस घटना की खबर मिली, तो वे अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए।उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया, जो शक्तिशाली और प्रचंड थे।

वीरभद्र ने अपने गणों के साथ दक्ष के यज्ञ में आक्रमण किया और वहां मौजूद दक्ष के समस्त यज्ञातिथियों और ऋषियों को उचित दंड दिया और अंततः दक्ष का सिर काटकर उसे हवनकुंड में डाल दिया। इसके बाद, वे सती के जलते हुए आधे शरीर को लेकर वहां से चले गए।

मार्ग में, सती के शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जो बाद में शक्तिपीठों के रूप में पूजे जाने लगे। भारत में इन शक्तिपीठों की संख्या 52 है, और हर शक्तिपीठ अपनी विशेषता और शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। सती के वियोग में भगवान शिव ने भी गहन वैराग्य धारण कर लिया और घोर तपस्या में लीन हो गए।

इन्हीं दक्ष प्रजापति की एक और पुत्री थीं, जिनका नाम स्वधा था, जिनका विवाह पितरों के साथ हुआ था। पितरों की तीन मानसी कन्याएं थीं – मैना, धन्या, और कलावती। एक बार यह तीनों कन्याएं भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए श्वेतद्वीप गईं, और उसी समय भगवान नारायण के दर्शन के लिए सनकादिक ऋषि भी वहाँ पहुंचे।

सनक, सनन्दन, सनातन, और सनत कुमार – इन चारों ऋषियों को देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग अपने-अपने स्थान से खड़े हो गए और उनका आदरपूर्वक प्रणाम एवं सम्मान किया। लेकिन पितरों की तीनों कन्याएं अपने स्थान से नहीं उठीं। इससे क्रोधित होकर चारों कुमारों ने उन्हें श्राप दिया कि वे स्वर्ग से दूर होकर मनुष्य योनि में जन्म लेंगी।

तीनों कन्याएं – मैना, धन्या, और कलावती – मुनियों के चरणों में गिर पड़ीं और विनम्रतापूर्वक बोलीं, “हे मुनिवर, हमें क्षमा करें।हमारी ऐसी भावना बिल्कुल भी नहीं थी कि हम आपका अपमान करें। मुनिवर, हमारी भूल थी कि हम आपके सम्मान में खड़े नहीं हुए। कृपया हम पर प्रसन्न हों और हमें क्षमा करें।”

जब तीनों कन्याएं इस प्रकार गिड़गिड़ाने लगीं, तो संत कुमारों ने उन पर दया दिखाते हुए आशीर्वाद दिया और कहा, “हे देवी, मेरा श्राप तो मिथ्या नहीं हो सकता। आपको मनुष्य की स्त्रियों के रूप में जन्म लेना ही पड़ेगा, परंतु इसमें हम थोड़ा संशोधन कर रहे हैं। आप मनुष्य रूप में तो अवश्य जन्म लेंगी, लेकिन इसमें विशेष सौभाग्य भी प्राप्त होगा।”

फिर ऋषि ने मैना से कहा, “हे देवी, तुम्हारा नाम मैना है, इसलिए तुम्हारा विवाह पर्वतराज हिमाचल से होगा। तुम पर्वतराज की पत्नी बनोगी और तुम्हारे घर में साक्षात जगदंबा का अवतार होगा। भगवान शंकर तुम्हारे दामाद बनेंगे। इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है?”

दूसरी बहन से ऋषि ने कहा, “तुम्हारा नाम धन्या है, लेकिन मनुष्य रूप में तुम्हारा नाम सुनैना होगा। हे सुनैना देवी, तुम्हारा विवाह महाराज जनक से होगा। तुम महाराज जनक की पत्नी बनोगी और साक्षात जगदंबा सीता तुम्हारे घर में अवतार लेंगी। साधारण दामाद नहीं मिलेगा, बल्कि तुम्हारे दामाद साक्षात भगवान श्री नारायण होंगे। यह कितना बड़ा सौभाग्य है।”

तीसरी बहन कलावती से कहा, “तुम्हारा नाम कलावती है, लेकिन मनुष्य रूप में तुम्हारा नाम कीर्ति होगा। तुम वृषभानु की प्रिया बनोगी और तुम्हारे घर में भगवान की आह्लादिनी शक्ति, श्री राधा रानी का जन्म होगा। और तुम्हारे दामाद कौन होंगे? वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं होंगे, बल्कि काले-काले मुरली वाले, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण होंगे।”

वरदान पाकर ये तीनों कन्याएं अपने घर वापस लौट आईं। समय आने पर, मैना का विवाह पर्वतराज हिमालय से हो गया। विवाह के बाद, सभी देवी-देवताओं ने राजा हिमालय और देवी मैना से निवेदन किया कि वे कठोर तपस्या करके देवी उमा को अपनी पुत्री रूप में प्राप्त करें, क्योंकि तारकासुर नामक राक्षस से मुक्ति केवल महादेव के पुत्र द्वारा ही संभव थी।

देवी सती के आत्मदाह के बाद यह कार्य अधूरा रह गया था, और इसे पूर्ण करने के लिए देवी सती को पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लेना था। देवताओं की आज्ञा का पालन करते हुए, राजा हिमालय और देवी मैना कठोर तपस्या में लीन हो गए। देवी मैना ने भक्ति भाव से देवी उमा की उपासना की और गंगा किनारे उनकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजन किया।

देवी मैना ने वर्षों तक कठोर व्रतों का पालन किया और विभिन्न प्रकार की तपस्या की, कभी अन्न-जल का त्याग किया, तो कभी केवल वायु पर ही निर्भर रहीं। 27 वर्षों की तपस्या के बाद, जगदंबा देवी उमा उनसे प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और वरदान मांगने को कहा।

तब देवी मैना ने निवेदन किया कि वे उनकी पुत्री के रूप में अवतरित हों। देवी उमा ने उन्हें यह वरदान दिया और पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। पर्वतों के राजा होने के कारण पार्वती को ‘शैलपुत्री’ भी कहा जाता है, और उनका एक अन्य नाम ‘हेमवती’ भी है।

शैलपुत्री का विवाह भगवान शिव से हुआ, और वे शिवजी की अर्द्धांगिनी बन गईं। शैलपुत्री देवी दुर्गा के सबसे शक्तिशाली रूपों में से एक मानी जाती हैं, और उनकी पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है। उनकी महिमा और शक्ति अनंत है।

माँ शैलपुत्री का पसंदीदा रंग

माँ शैलपुत्री का स्वरूप श्वेत वर्ण का है, इसलिए सफेद रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है। नवरात्रि के पहले दिन माँ को सफेद वस्त्र, फूल और अन्य सफेद सामग्री अर्पित करना शुभ माना जाता है।

माँ शैलपुत्री को अर्पित किया जाने वाला प्रिय भोग

माँ शैलपुत्री को सफेद रंग से संबंधित खाद्य पदार्थों का भोग, जैसे कि खीर और सफेद मिठाई, अति प्रिय होता है। इन्हें प्रसाद के रूप में अर्पित करने से माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

माँ शैलपुत्री की पूजा के लिए विशेष मंत्र

ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। 

या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।

वन्दे वंछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् |
वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||