
मधुराष्टकम 16वीं शताब्दी के महान वैष्णव संत श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य मधुरता का अनुपम वर्णन करता है। मधुराष्टकम का प्रत्येक श्लोक “मधुरम्” शब्द से प्रारंभ होता है, जो यह दर्शाता है कि श्रीकृष्ण का स्वरूप, मुस्कान, वाणी, चाल, बांसुरी, कर्म और करुणा—सब कुछ मधुर है।
इस स्तोत्र के माध्यम से श्री वल्लभाचार्य यह संदेश देते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर ही नहीं, बल्कि प्रेम, आनंद और भक्ति के साकार रूप हैं। मधुराष्टकम शुद्धाद्वैत भक्ति मार्ग का प्रतीक है, जहाँ ईश्वर से प्रेम निष्काम और शुद्ध भाव से किया जाता है।
मधुराष्टकम का पाठ या श्रवण करने से मन को आनंद, शांति और आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती है। यह भक्त के हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण को बढ़ाता है तथा जीवन से नकारात्मकता और मानसिक तनाव को दूर करता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से जन्माष्टमी, कृष्ण भजन, मंदिर पूजा और दैनिक साधना में अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
लिरिक्स – मधुराष्टकम्
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥१॥
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥२॥
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥३॥
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥४॥
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥५॥
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥६॥
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥७॥
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥८॥


