
जब भी बचपन की लीलाओं की बात आती है, मन स्वतः ही श्रीकृष्ण की ओर चला जाता है। नंद बाबा के आँगन से लेकर ब्रज की हर गली तक, कन्हैया की नटखट लीलाओं की मधुर गूँज सुनाई देती है। कहीं माखन की मटकी फूटती है, तो कहीं गोपियाँ हँसते-हँसते अपनी शिकायत लेकर माँ यशोदा के पास पहुँच जाती हैं।
श्रीकृष्ण को कान्हा, गोपाल, घनश्याम, बांके बिहारी जैसे कई नामों से जाना जाता है, लेकिन “माखन चोर” नाम में जो अपनापन है, वह कहीं और नहीं मिलता। यह नाम किसी चोरी का नहीं, बल्कि उस बाल रूप की याद दिलाता है, जो माखन चुराकर भी दिल जीत लेता है। यही मासूमियत और शरारत “मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो” भजन में सुंदर रूप से दिखाई देती है।
आज की यह लीला भी ऐसी ही है, जहाँ एक गोपी अपनी व्यथा लेकर ब्रजरानी के द्वार आई है।
माखन की मटकी में माखन नहीं, मिट्टी का गोला…
माखन चोर की नटखट लीलाएँ
माखन की मटकी और मिट्टी का गोला
ब्रज की दोपहर थी। आँगन में धूप छनकर गिर रही थी और यशोदा मैया घर के काम में लगी थीं। तभी एक गोपी भारी मन से आई। आँखों में शिकायत थी, पर शब्दों में अपनापन।
“ब्रजरानी यशोदा,” गोपी बोली, “तेरो लाला बहुत चतुर है। आज मेरे साथ बहुत बुरा किया है।”
यशोदा हँस पड़ीं। “अरी बहन, सबके लाला अच्छे हैं, बस मेरे लाला ही बुरे हैं क्या? बता तो सही, किया क्या मेरे कन्हैया ने?”
गोपी ने गहरी साँस ली और कहना शुरू किया – “एक दिन मैंने घर में साग-सब्जी नहीं बनाई थी। सोचा था कि जब ससुरजी खेत से लौटेंगे, तो उन्हें माखन और रोटी खिला दूँगी। दोपहर को वे आए। मैंने थाली में रोटी रखी, आसन बिछाया और ऊपर छींके से माखन की मटकी उतारकर सामने रख दी।”मटकी कपड़े से ढकी थी।
गोपी बोली – “मैं बोल भी नहीं सकती थी, मर्यादा थी। मन में दुविधा थी—अगर ज्यादा माखन रख दूँ तो कहेंगे बहू का हाथ बहुत चलता है, कम रखूँ तो कहेंगे माँ-बाप ने सिखाया नहीं। इसलिए पूरी मटकी ही रख दी और रसोई के द्वार पर खड़ी हो गई।” आँखें नम हो गईं।
“ब्रजरानी, जैसे ही ससुरजी ने मटकी से कपड़ा हटाया, उन्होंने रोटी की थाली उठाकर मेरे सिर पर दे मारी और बोले – ‘आज घर में या तो बहू रहेगी या मैं!’ और गुस्से में बाहर चले गए।”
गोपी काँपते स्वर में बोली – “मैं समझ ही नहीं पाई कि ऐसा क्या हो गया। जब मटकी देखी, तो उसमें माखन नहीं… मिट्टी का गोला था। तेरो लाला माखन खा गया और मिट्टी रख गया।”
इतने में कन्हैया आ गए। भोलेपन से बोले – “बाबा, क्या बात है? आप इतने नाराज क्यों हो?”
बाबा बोले – “तुझे कैसे पता मैं नाराज हूँ?”
कन्हैया मुस्कराए – “आप माला के दाने जल्दी-जल्दी फेर रहे हो, तभी समझ गया।”
बाबा ने सारी बात कह दी। कन्हैया मन ही मन मुस्कुरा रहे थे—करतूत तो उनकी ही थी।
फिर बोले – “बाबा, मैं तो ये बात मैया से कह दूँगा।”
“क्या कहेगा?” बाबा ने पूछा।
“कहूँगा—जिस गाँव की ये भाभी है, उसी गाँव से मेरी भी बात चल रही है।
और कहूँगा—वहाँ की छोरियाँ बड़ों से ऐसे ही हँसी-मजाक करती हैं।”
अब तो बाबा का गुस्सा और बढ़ गया। द्वार पर खड़ी गोपी घबराकर बोली – “कन्हैया, अब तो मान जा… बहुत हो गई।”
कन्हैया को दया आ गई। बोले – “बाबा, बहू अच्छी है। घर से तो नहीं निकालोगे ना? आओ, रोटी जीम लो।”
बाबा बोले – “मैं बहू के हाथ की रोटी नहीं खाऊँगा।”
तब कन्हैया ने कहा – “बाबा, आपको मेरी सौगंध है।”
बस फिर क्या था – ब्रज में भगवान की सौगंध कौन टाल सकता है? उसी क्षण बाबा उठे और रोटी जीम ली।
गोपी ने यशोदा से कहा – “तो देख ब्रजरानी, तेरे लाला ने मेरे साथ ये किया।”
गोपियों की रोज़-रोज़ की शिकायतें
कन्हैया रोज़ गोपियों के घर माखन चुराने जाते थे। साथ में सखा-मंडली भी होती। हर दिन गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुँच जातीं। आख़िरकार मैया थक गईं और एक दिन कन्हैया को घर में ही बैठा लिया। पूरा दिन बीत गया। कन्हैया के दर्शन नहीं हुए।
गोपियाँ बेचैन हो गईं – “आज कन्हैया कहाँ है?” पता चला – मैया ने घर में बंद कर रखा है।
बस फिर क्या था – सभी गोपियाँ उलाहना देने नंद के द्वार पर पहुँच गईं।
गोपियाँ बोलीं – “तेरा लाला असमय बछड़ों को खोल देता है। वे गायों का दूध पी जाते हैं और जब हम दूध दुहने जाएँ, तो गाय लात मारती है। दोहनी टूट जाए, कोहनी फूट जाए।”
यशोदा बोलीं – “अरी गोपियों, मेरो छोटो सो लाला है। तुम बड़ी हो, डांट दिया करो।”
गोपियाँ हँसते हुए बोलीं – “ब्रजरानी, जब हम डांटती हैं, तो ये लाल आँखें निकालकर हमें देखता है…
और फिर हँस देता है। उसकी हँसी देखकर हमारा गुस्सा भी हँसी बन जाता है।”
“इतना ही नहीं,” गोपियाँ बोलीं, “खुद भी माखन खाते हैं, बंदरों को भी खिलाते हैं। मटकी फोड़ देते हैं।
और अगर माखन न मिले, तो सोते बच्चों की चुकोटी भरकर भाग जाते हैं।”
पीछे खड़े प्रभु सब सुन रहे थे। मैया ने उनका हाथ पकड़ लिया – “लाला, देख ये सब तेरी शिकायतें हैं।”
कन्हैया मन ही मन बोले – “आज तो अकेला पड़ गया हूँ… जितना बोलूँगा, उतनी मुसीबत बढ़ेगी।”
मैया समझाने लगीं – “लाला, चोरी करना बुरी बात है।” और कन्हैया कहते है की मैया मैंने माखन नहीं खायो है।
लिरिक्स – मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
भोर भयो गैयन के पाछे, ।।२।।
मधुवन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो,
साँझ परे घर आयो
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
मैं बालक बहिंयन को छोटो, ।।२।।
छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं,
बरबस मुख लपटायो ॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
तू जननी मन की अति भोरी, ।।२।।
इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है,
जानि परायो जायो ॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
यह लै अपनी लकुटि कमरिया,।।२।।
बहुतहिं नाच नचायो ।
सूरदास तब बिहँसि जसोदा,
लै उर कंठ लगायो ॥
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो ।।२।।
भावार्थ
कन्हैया भोले मुख से मैया यशोदा से कहते हैं – “मैया, ये गोपियाँ झूठ बोल रही हैं। मैंने माखन नहीं खाया।”
वे मासूमियत से अपनी सफ़ाई देने लगते हैं – “मैं तो रोज़ सुबह गइया चराने चला जाता हूँ और शाम को श्याम बनकर घर लौट आता हूँ। मुझे तो ऐसा लगता है कि इन ग्वाल-बालों ने ही ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लगा दिया है।”
फिर कन्हैया मुस्कराते हुए कहते हैं – “मैया, तू ही सोच। तूने छींका इतना ऊँचा बाँध रखा है और मेरे हाथ कितने छोटे-छोटे हैं। इन नन्हे हाथों से मैं भला माखन की मटकी कैसे उतार सकता हूँ? तू तो बहुत भोली है मैया, ये सब मुझे बदनाम कर रहे हैं।”
इतना कहकर कन्हैया रूठ भी जाते हैं – “अब तो मैं गइया चराने भी नहीं जाऊँगा।”
सूरदास कहते हैं – कन्हैया की यह चतुराई और बाल-सुलभ बातें सुनकर यशोदा मैया मन ही मन मुस्करा उठती हैं। उनका हृदय पिघल जाता है और वे कन्हैया को गले से लगा लेती हैं।
फिर माँ प्यार से पूछती हैं – “लाला, सच-सच बता। तूने माखन खाया है या नहीं? तुझे मेरी सौगंध है।”
माँ की सौगंध सुनते ही कन्हैया झुक जाते हैं और धीरे से कहते हैं – “हाँ मैया, मैंने ही माखन खाया है।”
मैया तब गोपियों से कहती हैं – “देखो गोपियों, मेरे लाला ने जितना-जिसका माखन खाया है, मैं नंद के द्वार पर बैठकर सबको तोल-तोल कर लौटा दूँगी।” और हाथ जोड़कर विनती करती हैं – “पर गाली मत दीजो। यह मेरा गरीबनी का जाया है। बड़ी मुश्किल से मुझे यह लाला मिला है।” कहते-कहते मैया की आँखों में आँसू आ जाते हैं।
यह देखकर गोपियाँ मुस्करा उठती हैं। वे कहती हैं – “ऐसी कोई बात नहीं यशोदा। यह लाला केवल आपका नहीं है। यह पूरे ब्रज का है। हम तो उलाहना देने के बहाने इसके दर्शन करने आई थीं। उलाहना तो बस बहाना है, दर्शन ही तो हमें पाना है।”
फिर गोपियाँ प्रेम से कहती हैं – “कोई किसी के बालों पर मरता है, कोई चाल पर, कोई गालों पर।
पर हम तो बस नंद के लाल पर ही मरती हैं। यही हमारा जीवन-धन है।”
और तभी पूरा ब्रज गूँज उठता है –
बोलिए माखन चोर भगवान की जय!
बोलिए माखन चोर भगवान की जय!


