
“पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” 15वीं शताब्दी की संत-कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित एक हृदयस्पर्शी राजस्थानी भजन है। इस कविता में मीरा भगवान के नाम के अनमोल “धन” को पाने के बाद जिस गहन आनंद और पूर्णता का अनुभव करती हैं, उसे व्यक्त करती हैं। वह बताती हैं कि यह दिव्य खजाना किसी भी सांसारिक धन से अधिक मूल्यवान है—एक ऐसा आंतरिक सुख और शक्ति का स्रोत, जो समय के साथ और बढ़ता जाता है और जिसे न छीना जा सकता है, न खोया जा सकता है।
यह भजन भारत में अत्यंत लोकप्रिय हुआ, खासकर महान गायक डी. वी. पळुस्कर की सुरमयी प्रस्तुति के कारण। बाद में, जब लता मंगेशकर ने अपनी दिव्य और मधुर आवाज़ में इसे गाया, तो इसने और भी व्यापक प्रसिद्धि प्राप्त की। उनकी प्रस्तुति ने अनगिनत श्रोताओं को मीराबाई की आध्यात्मिक यात्रा से गहराई से जोड़ दिया। आज भी यह भजन लोगों के हृदय में गूंजता है, हमें भक्ति में मिलने वाली शांति और ईश्वर-प्रेम के अमूल्य धन की याद दिलाता है।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो – भजन लिरिक्स
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु ।
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु ।
किरपा कर अपनायो॥
पायो जी मैंने
किरपा कर अपनायो॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
जन्म जन्म की पूंजी पाई ।
जन्म जन्म की पूंजी पाई ।
जग में सबी खुमायो ॥
पायो जी मैंने
जग में सबी खुमायो ॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
खर्च ना खूटे, चोर ना लूटे।
खर्च ना खूटे, चोर ना लूटे।
दिन दिन बढ़त सवायो॥
पायो जी मैंने
दिन दिन बढ़त सवायो॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु।
भवसागर तरवयो॥
पायो जी मैंने
भवसागर तरवयो॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
मीरा के प्रभु गिरिधर नगर।
मीरा के प्रभु गिरिधर नगर।
हरख हरख जस गायो॥
पायो जी मैंने
हरख हरख जस गायो॥
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।


