
भारत के महाराष्ट्र राज्य ने अनेक महान संतों को जन्म दिया है, जिनमें पुरुष संतों के साथ-साथ कई सम्मानित महिला संत भी शामिल हैं। इसी परंपरा में ‘नामायकी दासी’ के रूप में जानी जाने वाली संत जनाबाई का परिचय अत्यंत महत्वपूर्ण है। ‘नामायकी दासी’ का अर्थ है—संत नामदेव की सेविका। संत नामदेव के सान्निध्य का प्रभाव ऐसा था कि जनाबाई भगवान विठ्ठल की अनन्य भक्त बन गईं।
महाराष्ट्र में उन्हें एक श्रेष्ठ कवयित्री के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। अपनी रचनाओं में उन्होंने दास्य-भाव, मातृत्व-स्नेह और भगवान के विविध अवतारों का अत्यंत हृदयस्पर्शी वर्णन किया है, जो उनके गहरे धार्मिक श्रद्धाभाव को प्रदर्शित करता है। उनकी कृतियाँ समाज को यह संदेश देती हैं कि भगवान भक्तों की रक्षा और दुष्टों का नाश करने के लिए अवतार लेते हैं।
संत जनाबाई की भाषा अत्यंत सरल और लोक-संवेदना से भरी हुई है, इसलिए उनकी कविताएँ साधारण लोगों के हृदय से सहज ही जुड़ जाती हैं। महाराष्ट्र के गाँवों में आज भी अनाज पीसते या धान कूटते समय उनकी रचनाएँ गाई जाती हैं, जो उनकी अटूट भक्ति और प्रेम की ज्वाला को दर्शाती हैं। संत जनाबाई की वाणी न केवल धार्मिक भावनाओं को जागृत करती है, बल्कि समाज में प्रेम और एकता का संदेश भी प्रसारित करती है।

जनाबाई का जन्मस्थान और संत नामदेव के घर में उनका सेवा जीवन
जनाबाई का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले के गंगाखेड़ गांव में हुआ था, जो गोदावरी तट पर स्थित है। उनके पिता दामा, शूद्र जाति के एक विट्ठल भक्त थे। जनाबाई की माता का नाम करुंद था, जो स्वयं भी भगवान विट्ठल की भक्त थीं। जब जनाबाई मात्र पाँच या छह वर्ष की थीं, तभी उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनके पिता, दामा, जनाबाई को पंढरपुर लेकर आए और उन्हें विठ्ठलभक्त दामाशेट्टी के घर छोड़कर चले गए।
दामाशेट्टी और कोई नहीं बल्कि संत नामदेव के पिता थे, जो संत ज्ञानेश्वर के बहुत करीबी मित्र और भक्त थे। जनाबाई ने संत नामदेव के घर में सेविका के रूप में कार्य करना शुरू किया। उन्होंने घर के सभी काम जैसे कपड़े धोना, आटा पीसना, भोग तैयार करना, बर्तन मांजना और झाड़ू-पोछा करना, पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ स्वयं करने लगीं।
जनाबाई को सेवा में अपार आनंद मिलने लगा। संत नामदेव की संगति और सेवा का उन पर गहरा असर हुआ, जिससे वे भी लगातार भगवान का नाम जपने लगीं। जिस तरह नामदेव जी भजन और कीर्तन करते थे, उसी तरह जनाबाई भी भक्ति में लीन होकर कीर्तन और नाम स्मरण करने लगीं।

जब विट्ठल ने वृद्धा के रूप में आकर जनाबाई जी के कपड़े धोए
एक दिन एकादशी का दिन था, और संत नामदेव जी के घर भक्तों की मंडली एकत्रित हुई थी। रात का समय था और जागरण का आयोजन हो रहा था। सभी भक्त भगवान के नाम कीर्तन और भजनों में मग्न थे—कोई कीर्तन कर रहा था, कोई मृदंग बजा रहा था, तो कोई करताल, ढोलक या मंजीरा बजा रहा था। भक्ति की मस्ती में सभी इतने तल्लीन थे कि किसी को अपने शरीर का होश तक नहीं था। कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था, और कई भक्तों की आँखों से भक्ति के आँसू बह रहे थे। इस आनंद में रात कैसे बीत गई, किसी को पता भी नहीं चला।
जागरण समाप्त होने के बाद लोग अपने-अपने घर लौट गए। जनाबाई भी अपने घर वापस आईं और विश्राम करने के लिए थोड़ी देर लेट गईं। लेकिन उनके मन से भगवत प्रेम की मस्ती अभी पूरी तरह नहीं उतरी थी, और वे इसी भक्ति में लीन होकर सो गईं। जब उनकी आँख खुली, तो देखा कि सूर्य उग चुका है और उन्हें उठने में देर हो गई।
जनाबाई ने सोचा कि आज काम में बड़ी देर हो गई है और नामदेव जी के घर में झाड़ू-पोछा और बर्तन की सफाई में देरी हो गई होगी। वे तुरंत जल्दी-जल्दी अपना काम करने लगीं, लेकिन सारे काम पूरे नहीं हो पाए। काम का सिलसिला बिगड़ने लगा और इससे सब जगह देरी होने लगी। घर के कामों जैसे झगड़ा देना, पानी भरना, कपड़े धोना और बर्तन साफ करना सब लंबित हो गए थे। जल्दी-जल्दी काम खत्म कर वे कपड़े धोने के लिए चंद्रभागा नदी के किनारे पहुंचीं।
कपड़े धोते समय अचानक उन्हें याद आया कि एक महत्वपूर्ण काम रह गया है, जो यदि तुरंत नहीं किया गया तो उनके स्वामी नामदेव जी को कष्ट होगा। इसलिए वे तुरंत नदी से उठकर नामदेव जी के निवास की ओर चल पड़ीं। रास्ते में चलते-चलते उनके मन में चिंता थी कि काम समय पर पूरा नहीं हुआ। तभी रास्ते में उन्हें एक वृद्धा मिली, जिसने जनाबाई को देखकर प्रेमपूर्वक कहा, “तुम चिंता मत करो, तुम घर का काम निपटाकर आओ, तब तक मैं तुम्हारे ये कपड़े धो देती हूँ।”
जनाबाई ने कहा, “नहीं माता, आप मेरे लिए कष्ट क्यों उठाएंगी? मैं अभी लौटकर आकर अपना काम खुद कर लूंगी।” वृद्धा मुस्कुराते हुए बोली, “बेटी, मेरे लिए कोई भी काम करना कठिन नहीं है। मैं सदा सभी काम कर लेती हूँ और इसमें मुझे कोई कठिनाई नहीं होती। यदि तुम्हारा मन नहीं मानता, तो कभी तुम मेरी सहायता कर देना।”
जनाबाई वृद्धा की स्नेहभरी बातों से प्रभावित होकर अपने काम की ओर बढ़ गईं। उन्हें यह पता नहीं था कि वह वृद्धा कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि स्वयं सच्चिदानंद भगवान थीं। वृद्धा ने कुछ ही समय में सारे कपड़े धोकर साफ कर दिए। थोड़ी ही देर में जब जनाबाई वापस लौटीं, तो उनके हृदय में कर्तव्य भाव उमड़ आया। उन्होंने वृद्धा से कहा, “माता, आज आपके कारण मुझे बहुत सहायता मिली।”
वृद्धा मुस्कुराते हुए बोलीं, “मुझे तुम्हारा काम करने में कोई कष्ट नहीं हुआ। लो, अपने कपड़े ले लो, और मैं अब चलती हूँ।” इतना कहकर वृद्धा वहां से चली गईं। जनाबाई के हृदय में वृद्धा के प्रति अपार स्नेह उमड़ आया, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि वह वृद्धा कब और कहां चली गईं। जब जनाबाई ने चारों ओर देखा, तो वृद्धा कहीं नजर नहीं आईं।
जनाबाई, सारे कपड़ों को लेकर नामदेव जी के घर पहुंचीं। उनका हृदय बड़ा व्याकुल था। ह बार-बार यही सोच रही थीं कि आखिर वह वृद्धा कौन थी? उसकी मुस्कान ने ऐसा क्या जादू कर दिया कि जनाबाई का चित्त हर पल उसी का स्मरण कर रहा था। अपने भावुक हृदय से वह नामदेव जी के पास गईं और पूरी घटना सुनाई।
नामदेव जी ने सुना और तुरंत ही बोले, “अरे जनाबाई, वह कोई साधारण वृद्धा नहीं थी, वह तो स्वयं विट्ठल थे!” यह सुनते ही जनाबाई हैरान रह गईं। नामदेव जी भी चकित थे कि विट्ठल भगवान जनाबाई से इतना स्नेह करते हैं कि स्वयं आकर उनके सारे कपड़े धो दिए। उन्होंने कहा, “तू कितनी सौभाग्यशाली है, जनाबाई! ठाकुर की कृपा तुझ पर हुई, और तू यह पहचान न पाई।”
यह सुनकर जनाबाई का हृदय और भी प्रेम से भर गया, और उनकी आंखों में आंसू आ गए। वह भावुक होकर बोलीं, “प्रभु, आप तो छलिया निकले! आए भी और मुझे पहचानने का मौका भी नहीं दिया। और आपने मेरे लिए इतना कष्ट सहा, मेरे सारे कपड़े धोए!” जनाबाई की आंखों से अश्रु बहने लगे, और उनका प्रेम और भी गहरा हो गया।

जब भगवान विट्ठल ने जनाबाई के लिए खुद कूड़ा उठाया और चक्की चलाई
इस घटना के बाद से जनाबाई की भक्ति का स्वरूप ही बदल गया। वे इतनी गहरी भक्ति में लीन हो गईं कि उनके शरीर का हर कण भगवन्नाम का जाप करने लगा। अब तो यह रोज़ की बात हो गई थी। जब जनाबाई घर के काम करते-करते भक्ति में खो जातीं।
एक बार जनाबाई, जो हमेशा अपने काम में मगन रहती थीं, प्रेम में डूबी हुई झाड़ू लगा रही थीं। जब उन्होंने कूड़े का ढेर इकट्ठा कर लिया और उसे भरने के लिए वापस आईं, तो देखा कि विट्ठल स्वयं टोकरी लिए हुए कूड़ा भर रहे थे। पहले प्रभु बुढ़िया के रूप में आते थे, लेकिन अब वे साक्षात् विट्ठल के रूप में उनकी मदद कर रहे थे।
कई बार, जब जनाबाई चक्की में आटा पीसते हुए भगवान के भजन गातीं, तो भाव-विभोर होकर चक्की रोक देतीं। सेवा में कोई कमी न हो जाए, इस चिंता में ठाकुर जी खुद आकर चक्की चलाने लगते। वे जनाबाई के अभंग सुनते रहते और जनाबाई अपने भक्ति-भाव में डूबी रहतीं। जब जनाबाई झाड़ू लगातीं, तो कचरा खुद भगवान विट्ठल उठाते थे। वे टोकरी सिर पर रखकर जनाबाई के पीछे-पीछे चलते, मानो उनकी सेवा का कर्ज़ चुका रहे हों।
विट्ठल बार-बार जनाबाई से कहते, “मैं तुम्हारा ऋणी हूँ। यह ऋण कैसे चुकाऊँ, तुम ही बताओ।” जनाबाई की सेवा और प्रेम के प्रति भगवान की ऐसी विनम्रता अद्भुत थी।
जब जनाबाई ओखली में धान कूटतीं, तो विट्ठल उनके सामने खड़े होकर मुस्कुराते रहते। जनाबाई कहती थीं कि यह सब उनके गुरु, नामदेव जी की कृपा से ही संभव हुआ। उन्होंने नामदेव जी की सेवा करते हुए जाना कि इस संसार में दूसरा कोई नहीं है, केवल विट्ठल ही सर्वत्र व्याप्त हैं। वे हर समय मेरे साथ हैं, मेरी सेवा में लगे रहते हैं।

भगवान की भक्ति में समर्पित जनाबाई को क्यों दी गई सूली की सजा?
विट्ठल भगवान भी जनाबाई के प्रेम से इतने प्रसन्न थे कि वे खुद रोज़ रात उनके घर आते, उनके हाथ की रोटी खाते और फिर मंदिर लौट जाते। एक रात वे अचानक बोले, “आज मुझे मंदिर जाने का मन नहीं है, जनाबाई। अगर तू कहे तो यहीं सो जाऊं, सुबह मंगला आरती के लिए चला जाऊंगा।” जनाबाई चौंक गईं और बोलीं, “प्रभु, आप यहीं सोएंगे? लेकिन मेरे पास तो कोई बिस्तर भी नहीं। आपके मंदिर में तो रेशम की गद्दी और तकिया होता है, यहां मेरी झोंपड़ी में तो बस फटी-पुरानी चटाई है।”
ठाकुर जी हंसते हुए बोले, “तू चिंता मत कर, मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी।” अब हर रात ठाकुर जी वहीं सोने लगे। जनाबाई के पास कुछ भी खास साधन नहीं था, तो वह एक पुरानी चटाई बिछा देतीं और ठाकुर जी उसी पर सो जाते। जनाबाई का शरीर कठोर हो गया था, उन्हें न सर्दी लगती, न गर्मी। लेकिन ठाकुर जी तो कोमल थे, उन्हें ठंड सताने लगी। ऐसे में जनाबाई अपनी पुरानी, घिसी हुई कंबल ठाकुर जी पर ओढ़ा देतीं और प्रभु चैन से सो जाते।
हर सुबह मंगला आरती से पहले ठाकुर जी उठते, अपने आभूषण और सिंगार संभालते और मंदिर चले जाते। यह रोज़ की बात हो गई थी, पर किसी को कुछ पता नहीं चलता। ठाकुर जी जनाबाई से कहते, “किसी को मत बताना कि मैं यहां आता हूं।”
एक रात भगवान विट्ठल रोज़ की तरह जनाबाई के घर पर सोए, लेकिन सुबह उठने में थोड़ी देर हो गई। मंगला का घंटा बजने लगा और वे जल्दी-जल्दी में अपने आभूषण और पीतांबर वहीं छोड़कर जनाबाई की कंबल ओढ़कर ही मंदिर चले गए। जब मंदिर के द्वार खुले और पुजारियों ने ठाकुर जी को देखा, तो वे हैरान रह गए। उनके सारे आभूषण गायब थे, और उन्होंने जनाबाई की पुरानी, फटी हुई कंबल ओढ़ रखी थी!
मंदिर में हंगामा मच गया। पुजारी एक-दूसरे से पूछने लगे, “यह क्या हो गया? ठाकुर जी के सारे आभूषण कहां गए? और यह कंबल किसकी है?” जनाबाई रोज़ मंदिर आती थीं, और उनकी यह कंबल सब पहचानते थे, क्योंकि इस पर “विट्ठल विट्ठल” लिखा था और इसमें कई जगह सिलाई लगी हुई थी। पुजारी समझ गए कि यह जनाबाई की ही है। अब सबको शक हो गया कि जनाबाई ने ठाकुर जी के आभूषण चुरा लिए हैं!
जनाबाई अपने रोज़ के काम में लगी थीं, जब पुजारियों का एक समूह उनके घर आ धमका। वे बोले, “जनाबाई, तूने ठाकुर जी के आभूषण चुरा लिए हैं!” जनाबाई स्तब्ध रह गईं। वे जान गईं कि यह सब ठाकुर जी की लीला है, लेकिन वे कुछ भी नहीं कह सकती थीं, क्योंकि ठाकुर जी ने उनसे कहा था कि यह गुप्त बात है। उन्होंने पुजारियों से कहा, “महाराज, मैं कुछ नहीं जानती। यह कंबल तो मेरी है, पर बाकी कुछ मुझे नहीं पता।”
लेकिन पुजारियों ने जनाबाई की एक न सुनी और उन्हें पकड़कर मंदिर ले गए। वहाँ पंचायत बुलाई गई और फैसला हुआ कि जनाबाई को मृत्यु दंड दिया जाएगा। उन्हें चंद्रभागा नदी के किनारे सूली पर चढ़ाने का निर्णय हुआ। जब जनाबाई को सूली पर चढ़ाने की तैयारी हो रही थी, उन्होंने अंतिम प्रार्थना की, “विट्ठल, अगर इस शरीर को ऐसे छोड़ना है, तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे तो बस यही प्रार्थना है कि मेरे गुरु का नाम बदनाम न हो।”
और तभी, जैसे ही जनाबाई ने प्रार्थना पूरी की, चमत्कार हुआ! साक्षात विट्ठल भगवान वहाँ प्रकट हो गए। उनका तेज देखकर सभी स्तब्ध रह गए। भगवान ने कहा, “यह आभूषण जनाबाई ने नहीं चुराए, बल्कि मैं खुद उन्हें छोड़ आया था। जनाबाई की सेवा और प्रेम मुझे इतना प्रिय है कि मैं रोज़ इसके घर आता हूं, इसके हाथ की रोटी खाता हूं, और सोता हूं। आज मैं जल्दी में अपने आभूषण वहीं छोड़ आया था।”
यह सुनकर सभी पुजारी भगवान के चरणों में गिर पड़े। जनाबाई की जय-जयकार होने लगी। पंढरपुर में चारों ओर भगवान विट्ठल और जनाबाई की भक्ति की गाथा गूंजने लगी।

जब जनाबाई के गोबर के कंडों से गूंजा विट्ठल-विट्ठल का नाम
कबीर दास जी ने जनाबाई की भक्ति और महिमा के बारे में बहुत कुछ सुना था। उनके भजनों की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी, और कबीर जी के कानों में भी उनकी प्रशंसा पहुंची। उन्होंने मन में सोचा, “ऐसी महान भक्त के दर्शन तो करने ही चाहिए।” इस विचार के साथ कबीर जी महाराष्ट्र के पंढरपुर पहुंचे।
पंढरपुर पहुंचकर कबीरदास जी ने गांव वालों से जनाबाई के बारे में पूछा। एक व्यक्ति ने कहा, “वो जो सामने दो औरतें झगड़ रही हैं, उनमें से एक जनाबाई हैं।” यह सुनकर कबीरदास जी चौंक गए। उन्होंने सोचा, “कैसे हो सकता है कि इतनी बड़ी भक्त झगड़ा कर रही हो?” वे थोड़े अविश्वास में, परंतु उत्सुकता के साथ उस ओर बढ़े।
जब वे करीब पहुंचे, तो देखा कि जनाबाई और एक अन्य महिला आपस में तीखी बहस कर रही थीं। कबीरदास जी ने विनम्रता से पूछा, “क्या आप ही जनाबाई हैं?” जनाबाई, अभी भी गुस्से में, बोलीं, “हां, तो क्या?” कबीरदास जी ने सहजता से कहा, “मैं तो आपके दर्शन के लिए आया था। सुना था, आप विठ्ठल की बड़ी भक्त हैं। मगर, आप किस बात पर झगड़ रही हैं?” जनाबाई ने गुस्से में कहा, “इसने मेरे गोबर के कंडे चुरा लिए हैं।”
जनाबाई ने गुस्से में कहा, “इसने मेरे गोबर के कंडे चुरा लिए हैं।” जनाबाई ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “नहीं! मुझे अपने ही कंडे वापस चाहिए।” कबीरदास जी ने कहा, “आप अपने कंडे कैसे पहचानेंगी? सभी कंडे तो एक जैसे ही होते हैं।” जनाबाई ने मुस्कुराते हुए एक कंडा उठाया, उसे कान से लगाया, और फिर उसे फेंक दिया। दूसरे कंडे को उठाकर कान से लगाया, और फिर उसे भी अलग रख दिया। इसी तरह कई कंडों को सुनती रहीं, और जब सही कंडा मिला, तो बोलीं, “यह मेरा है।”
कबीरदास जी ने आश्चर्य से पूछा, “आप कंडों में ऐसा क्या सुन रही हैं?” जनाबाई ने एक कंडा कबीरदास जी को थमाया और कहा, “आप भी सुनिए।” कबीरदास जी ने कंडे को कान से लगाया, और जैसे ही उसे सुना, उनका दिल आनंद से भर गया। कंडे से ‘विठ्ठल-विठ्ठल’ की ध्वनि आ रही थी। कबीरदास जी को समझ में आ गया कि जनाबाई की भक्ति इतनी गहरी और पवित्र है कि उनके स्पर्श से निर्जीव चीजें भी भगवान का नाम जपने लगती हैं।
इस अनोखे अनुभव से अभिभूत होकर कबीरदास जी ने जनाबाई के चरणों में झुककर प्रणाम किया और सोचा, “सच्ची भक्ति का ऐसा अद्भुत प्रभाव मैंने आज पहली बार देखा है।”


