शिव महिम्न स्तोत्र की पौराणिक कथा: जानिए इसकी रचना कैसे हुई?

शिव महिम्न स्तोत्र की पौराणिक कथा: कैसे पुष्पदंत ने शिवमहिम्न स्तोत्र की रचना की?

शिव महिम्न स्तोत्र भगवान शिव की अद्भुत, अलौकिक और अनंत महिमा का वर्णन करने वाला पवित्र स्तोत्र है। इसे गंधर्वराज पुष्पदंत ने भगवान शिव के प्रति अत्यंत प्रेम और भक्ति भाव से रचा था। यह स्तोत्र न केवल शिवजी को अत्यंत प्रिय है, बल्कि भक्तों के लिए मोक्ष का मार्ग भी माना जाता है।

43 श्लोकों से युक्त यह अद्भुत स्तोत्र शिव पुराण का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जो भी भक्त इसे श्रद्धा और भक्ति से पढ़ता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान शिव की दिव्य कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र पापकर्मों को दूर करने वाला और शिवभक्तों द्वारा अत्यंत प्रिय माना जाता है।

इस स्तोत्र को स्वयं भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। इस लेख में आप शिव महिम्न स्तोत्र की पौराणिक उत्पत्ति और भक्तों के लिए इसके आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से जानेंगे।

शिव महिम्न स्तोत्र की रचना किसने की?

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई स्तोत्र और प्रार्थनाएं प्रचलित हैं। शिवतांडव स्तोत्र, जो रावण की भक्ति का उदाहरण है, व्यापक रूप से जाना जाता है। लेकिन शिव महिम्न स्तोत्र की कहानी और महत्व बहुत कम लोग जानते हैं। इस अद्भुत स्तोत्र की रचना गंधर्वराज पुष्पदंत ने की थी, और यह केवल शिव की महिमा का गान ही नहीं है, बल्कि इसमें भक्ति, पश्चाताप और शिव की सहज सादगी का भी गहन वर्णन है।

पुष्पदंत नामक एक गंधर्व, जो अपने गायन और काव्य के लिए प्रसिद्ध थे, ने शिव की अनंत महिमा को इन छंदों में समेटा। यह रचना उन्होंने तब की जब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। अपने प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने भगवान शिव की स्तुति में यह स्तोत्र लिखा। संस्कृत में रचित यह स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं, जिसमें न केवल शिव के देवाधिदेव स्वरूप को, बल्कि उनकी करुणा, सरलता और उनके प्रति भक्तों के अटूट विश्वास को भी दर्शाया गया है।

यह स्तोत्र प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथ “शिव पुराण” का भी एक भाग है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से न केवल भक्त के जीवन में सुख-शांति आती है, बल्कि शिव की असीम कृपा भी प्राप्त होती है।

पुष्पदंत राजा चित्ररथ के बगीचे में चुपचाप फूल तोड़कर शिवलिंग पर अर्पित करते हुए।

कैसे पुष्पदंत ने शिवमहिम्न स्तोत्र की रचना की?

पुष्पदंत, जो गंधर्व थे, इंद्रलोक की सभा में बैठकर दिव्य संगीत, भजन, और कीर्तन में लीन रहते थे। उनकी मधुर वाणी और सुरों से पूरी सभा सजीव हो उठती थी। लेकिन एक दिन उनके मन में आया कि स्वर्गलोक से बाहर निकलकर पृथ्वी पर भ्रमण किया जाए और वहां की सुंदरता और भक्ति का अनुभव किया जाए।

गंधर्व होने के नाते पुष्पदंत को अदृश्य रहने का वरदान प्राप्त था। उनकी उपस्थिति किसी को दिखाई नहीं देती थी, न उनकी वाणी सुनाई देती थी, और न ही उनके कार्यों का कोई आभास होता था। इस वरदान के साथ, वे पृथ्वी पर आए। उनका मन शिवभक्ति में रमा रहता था, और वे भगवान शंकर की आराधना, स्मरण और भजन में डूबे रहते थे।

पृथ्वी पर आते ही, पुष्पदंत ने एक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया और प्रतिदिन फूल-बिल्वपत्तों से उसकी पूजा करने लगे। उस समय चित्ररथ नाम के एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा हुआ करते थे, जो भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनके दिन की शुरुआत भगवान शिव के पूजन से होती थी, जिसमें उन्हें प्रतिदिन ताजे और सुंदर पुष्पों की आवश्यकता होती थी।

अपनी भक्ति को सरल और व्यवस्थित बनाने के लिए, राजा ने अपने राज्य में एक अद्भुत उद्यान का निर्माण करवाया। इस उद्यान में मोगरा, चमेली, चंपा, कमल, कृष्णकमल, गेंदा जैसे रंग-बिरंगे और सुगंधित पुष्प खिले रहते। इसके साथ ही, हजारों बिल्व वृक्ष उद्यान में लगाए गए, जो शिव पूजन में सबसे अधिक प्रिय माने जाते हैं। राजा चित्ररथ प्रतिदिन इस उद्यान से ताजे फूलों को चुनवाते और श्रद्धापूर्वक उन्हें भगवान शिव के चरणों में अर्पित करते।

एक दिन श्री पुष्पदंत भ्रमण करते-करते वे चित्ररथ नामक राजा के सुंदर उद्यान में पहुंचे। उद्यान की अद्भुत शोभा और उसमें खिले रंग-बिरंगे फूलों को देखकर पुष्पदंत मंत्रमुग्ध हो गए। पुष्पदंत ने उन पुष्पों को देखा और मन में विचार किया, “ऐसे सुंदर पुष्प केवल देखने के लिए नहीं, बल्कि शिवपूजन जैसे पवित्र कार्य में समर्पित होने चाहिए।”

अगले दिन, प्रभातकाल में, पुष्पदंत उसी उद्यान में पहुँचे। बिना राजा की अनुमति के, वे अदृश्य रहकर फूल तोड़ने लगे और उन्हें शिवलिंग पर अर्पित करते रहे। यह क्रम कई दिनों तक चला। उनके मन में कोई स्वार्थ नहीं था। उनका केवल एक ही उद्देश्य था—इन दिव्य पुष्पों को भगवान शिव के चरणों में अर्पित करना। उन्हें यह अहसास नहीं हुआ कि यह कार्य राजा चित्ररथ के उद्यान का नियम भंग कर सकता है। वह तो केवल अपनी भक्ति में तल्लीन थे, और यही सोचते थे कि शिव का पूजन ही इन पुष्पों का सबसे उत्तम उपयोग है।

राजा चित्ररथ द्वारा बिछाए गए पवित्र बिल्वपत्रों पर अनजाने में कदम रखता हुआ पुष्पदंत।

अगले दिन जब राजा चित्ररथ पूजा के लिए बाग में गए, तो उन्होंने देखा कि उनके प्रिय पुष्प गायब हैं। राजा ने इसे ईश्वर की इच्छा समझकर अनदेखा किया, लेकिन जब ऐसा बार-बार होने लगा, तो वे चिंतित हो गए। उन्होंने कई प्रयास किए यह जानने के लिए कि कौन उनके पूजा-पुष्प चुरा रहा है, लेकिन हर बार असफल रहे। दरअसल, पुष्पदंत अपनी दिव्य शक्तियों के कारण अदृश्य बने रहते थे।

आखिरकार, राजा ने एक युक्ति सोची। उन्होंने शिवलिंग पर चढ़ाए गए पवित्र बिल्वपत्र और फूलों को अपने उद्यान के मुख्य द्वार और पगडंडियों पर बिछा दिया। पुष्पदंत, इस योजना से अनजान, जब फूल लेने आए, तो उनका पैर उन पवित्र बिल्वपत्रों पर पड़ा। जैसे ही उन्होंने उन पर कदम रखा, उनकी दिव्य अदृश्यता की शक्ति समाप्त हो गई।

राजा चित्ररथ के सैनिकों द्वारा पुष्पदंत को पकड़कर दरबार में ले जाते हुए।

पुष्पदंत को यह एहसास हुआ कि उन्होंने अंजाने में एक बड़ी भूल कर दी। वे समझ गए कि उन्होंने भगवान शिव की पूजा के लिए दूसरों की संपत्ति का उपयोग करके गलत किया है। राजा चित्ररथ ने उन्हें पकड़ लिया और सभा में ले गए। जब पुष्पदंत ने अपनी पहचान बताई, तो उन्होंने ईमानदारी से अपनी भूल स्वीकार की और कहा, “मैंने केवल भगवान शिव की पूजा के लिए यह किया, लेकिन मैं समझ नहीं सका कि मेरी यह पूजा उचित नहीं थी।”

उन्होंने गहन पश्चाताप करते हुए भगवान शिव से क्षमा मांगी, उन्होने वहीं एक शिवलिंग का निर्माण किया और विधिपूर्वक पूजा की और भगवान शिव की उपासना में ध्यानमग्न होकर हृदय से प्रार्थना की। इस प्रार्थना के दौरान उन्होंने दिव्य छंदों की रचना की, जिनमें भगवान शिव की महिमा और उनकी अनुकंपा का वर्णन था। इन छंदों में पुष्पदंत का पश्चाताप, श्रद्धा और भक्ति झलक रही थी।

भगवान शिव, पुष्पदंत की इस आत्मा से उपजी प्रार्थना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने न केवल पुष्पदंत को क्षमा किया, बल्कि उनकी खोई हुई शक्तियां भी उन्हें लौटा दीं। भगवान शिव, पुष्पदंत से बोले, “हे गंधर्व, तुमने जिस श्लोक संग्रह से मेरी स्तुति की है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है। यह श्लोक संग्रह युगों-युगों तक ‘श्री शिवमहिम्न स्तोत्र’ के रूप में प्रचलित होगा और इसे गाने या पढ़ने वाला हर भक्त मेरी कृपा का पात्र बनेगा।”

महादेव ने आगे कहा, “तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग, जिसे आज से ‘पुष्पदंतेश्वर शिवलिंग’ के नाम से जाना जाएगा, सभी प्राणियों के लिए सुख, शांति और मोक्ष का स्रोत बनेगा। जो भी इसकी श्रद्धा से आराधना करेगा या केवल दर्शन करेगा, उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। और जो भक्त इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह असीम पुण्य का अधिकारी बनेगा और मेरी अनुकंपा से कृतार्थ होगा।”