श्रीबाई माता की संपूर्ण कथा: प्रजापति समाज की कुलदेवी श्री यादे माता और भक्त प्रह्लाद से जुड़ी रहस्यमयी गाथा

श्रीबाई माता की संपूर्ण कथा: प्रजापति समाज की कुलदेवी श्री यादे माता और भक्त प्रह्लाद से जुड़ी रहस्यमयी गाथा

जब मैंने पहली बार श्रीबाई माता की कथा सुनी, तो मुझे लगा कि यह केवल एक देवी की कहानी है। लेकिन जैसे-जैसे मैं इसे समझता गया, मुझे यह स्पष्ट हुआ कि यह कथा केवल देवी का जीवन नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति, निष्ठा और धर्म की अमर गाथा है। जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, यदि मन ईश्वर में स्थिर है, तो अंधकार स्वयं प्रकाश में बदल जाता है। श्रीबाई माता ने अपने जीवन में यही किया और प्रजापति समाज के प्रत्येक भक्त के लिए भक्ति और धर्म का दीप जलाया। उनकी यह कथा आज भी हर भक्त के हृदय में विश्वास और आध्यात्मिक प्रेरणा भर देती है।

श्रीबाई माता के विभिन्न नाम

प्रजापति समाज में श्रीबाई माता को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। गुजरात में उन्हें बाई माता या बायसा माता के नाम से जाना जाता है, वहीं राजस्थान और मध्य प्रदेश में लोग उन्हें यादे माता कहते हैं। महाराष्ट्र में उनका नाम बाय माता के रूप में प्रसिद्ध है, और उत्तर भारत में उन्हें यादे माई के नाम से श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। इसके अलावा उन्हें श्री सरियादेवी माता जी के नाम से भी जाना जाता है। भले ही उनके नाम अलग-अलग हों, पर सभी जगह उनकी भक्ति और श्रद्धा एक जैसी है।

श्रीबाई माता: प्रजापति समाज की कुलदेवी

कुम्हार समाज, जिसे प्रजापति समाज के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। “कुम्हार” शब्द स्वयं “कुंभ” यानी घड़ा बनाने वाले से उत्पन्न हुआ है। मिट्टी और धरती से जुड़ा यह समाज केवल बर्तन बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों, परंपराओं और संस्कृतियों का आधार भी रहा है।

प्राचीन काल से प्रजापति समाज मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध रहा है। इन्हें धरती माता के पुत्र माना जाता है क्योंकि वे मिट्टी से जीवंत कला रचते हैं। प्राचीन ग्रंथों में भी उल्लेख है कि दक्ष प्रजापति, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, इस समाज के आदि पूर्वज माने जाते हैं।

इस गौरवशाली समाज की कुलदेवी हैं — श्रीबाई माता, जिन्हें श्रीयादे माता के नाम से भी जाना जाता है।

श्रीबाई माता केवल देवी ही नहीं, बल्कि भक्त प्रह्लाद की आध्यात्मिक गुरु और भक्ति की प्रेरणा स्त्रोत भी हैं।

श्रीबाई माताजी का प्रागट्य

कथा बहुत ही अद्भुत है। श्रीबाई माताजी का प्रागट्य कथा आदि अनादि काल से संबंधित है।

ब्रह्माजी की तपस्या और “श्री” नाम का प्रागट्य

एक समय भगवान विष्णु नारायण ने ब्रह्माजी को तपस्या करने का आदेश दिया। भगवान विष्णु नारायण के कहने पर ब्रह्माजी ने कई युगों तक तपस्या की।

एक दिन अचानक उनके मुख से ‘ओम श्री ओम’ का जप निकलने लगा। ब्रह्माजी इतने गहन समाधि में थे कि स्वयं उन्हें भी पता नहीं चला कि यह जप कैसे हो रहा है। तब भगवान शिव ने उन्हें जागृत किया और पूछा, “हे ब्रह्मदेव, आप किसका जप कर रहे हैं?”

ब्राह्माजी ने उत्तर दिया, “हे प्रभु, मुझे भी ज्ञात नहीं कि मैं ‘श्री’ का जप कर रहा हूँ।” तब ब्रह्माजी की ब्रह्म शक्ति से ‘श्री’ शब्द चेतन हुआ और उनकी नाभि कमल से श्री नाम की कन्या उत्पन्न हुई। ब्रह्माजी ने उसे भगवान विष्णु नारायण की सेवा में अर्पित कर दिया।

सनकादिक ऋषियों और जय–विजय का प्रसंग

एक बार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार — ये चारों सनकादिक ऋषि, जो देवताओं के पूर्वज माने जाते हैं — सम्पूर्ण लोकों से विरक्त होकर चित्त की शांति के लिए भगवान विष्णु के दर्शन हेतु उनके बैकुण्ठ लोक में गए।

बैकुण्ठ के द्वार पर जय और विजय नामक द्वारपाल पहरा दे रहे थे। उन्होंने ऋषियों को भीतर जाने से रोक दिया।

ऋषियों ने कहा:
“अरे मूर्खों! हम भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। हमें दर्शन करने दो। तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें समदर्शी होना चाहिए।”

लेकिन जय और विजय नहीं माने। क्रोधित होकर ऋषियों ने कहा:
“भगवान के समीप रहते हुए भी तुम अहंकारी हो। अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता। इसलिए हम तुम्हें शाप देते हैं कि तुम पापयोनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो।”

जय और विजय भयभीत होकर ऋषियों के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगने लगे।

भगवान विष्णु ने स्वयं ऋषियों से कहा:
“हे मुनीश्वरों! ये मेरे पार्षद हैं। इन्होंने अहंकार के कारण आपकी अवज्ञा की, और मेरे प्रिय भक्त होने के बावजूद आप उन्हें शाप दे रहे हैं। आपने उत्तम कार्य किया है। सेवकों का अपराध होने पर भी मैं स्वयं उसे मानता हूँ।”

ऋषियों का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा,
“हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध में शाप दिया। अगर आप उचित समझें तो इन्हें हमारे शाप से मुक्त कर सकते हैं।”

भगवान विष्णु ने उत्तर दिया:
“हे मुनिगण! मैंने सर्वशक्तिमान होते हुए भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं मानना चाहिए। ये तीन जन्म असुर योनि में जाएंगे, और हर बार मैं स्वयं इनका संहार करूंगा। इसके बाद ये पुनः इस धाम में वापस आएंगे।”

इस शाप के कारण सतयुग में जय–विजय हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बने।

श्रीबाई माता जी का जन्म

भगवान विष्णु ने श्री नाम की कन्या को धरती पर अवतार लेने का आदेश दिया। वह भारतखंड के वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र के “मुहू” नामक छोटे गाँव में जन्मी।

इस गाँव में तीन-चार प्रजापति रहते थे। उनमें से एक धर्मपरायण और संस्कारी दुदा भगत रहता था, जिसके घर में संतान नहीं थी। उनकी धर्मनिष्ठ पत्नी हिरबाई शिव उपासिका थीं। भगवान विष्णु के आदेश से श्रीबाई माता इसी दंपति के घर जन्मी। जन्म के समय गाँव के ब्राह्मण ने उनका नाम रखा – श्रीबाई

श्रीबाई माता बचपन से ही भगवत भक्ति में लीन रही और परमात्मा विष्णु की सच्ची भक्ति में रची-बसी। जब उनकी आयु हुई, तो उनका विवाह उड़ण भगत (उड़न केशरी) से हुआ, जो स्वयं विष्णु भक्त थे और राजस्थान में रहते थे।

उस समय, वर्तमान सौराष्ट्र के गिर-तालाला क्षेत्र में एक नगरी थी, जिसे सोनलपरी नगरी कहा जाता था। वहां हिरण्यकशिपु नामक दानव का राज्य था, जो स्वयं भगवान विष्णु के द्वारपाल जय का रूप था।

भगवान विष्णु ने श्रीबाई माता को निर्देश दिया कि वे सोनलपरी नगरी जाएँ, जहाँ हिरण्यकश्यपु का शासन है और राम नाम लेने पर रोक है तथा ऋषि-मुनियों को परेशान किया जाता है। वहाँ आप धर्म की स्थापना करें और भक्ति का प्रकाश फैलाएँ। जब भी कोई संकट आए, मुझे याद करना, मैं हमेशा आपके साथ रहूंगा।

श्रीबाई माता द्वारा आग में बचे बिल्ली के बच्चों को बचाते हुए भक्त प्रह्लाद का दृश्य।

श्रीबाई माता का चमत्कार: बिल्ली के बच्चों की रक्षा करना और प्रह्लाद का आध्यात्मिक मार्गदर्शन

श्रीबाई माता और उड़ण भगत सोनलपरी नगरी पहुँचे। उन्होंने रास्ते में काठियावाड़ के वर्तमान राजकोट के पास तरघड़िया नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाई और वहाँ अपना निवास किया।

श्रीबाई माता जी का नियम था कि रोज शाम को भोजन के बाद रामायण पढ़ना और हरिगुण गाना।

एक दिन मध्यरात्रि को आकाश मार्ग से भगवान विष्णु की दो परी – राजलदे और साजलदे और इंद्र के गंधर्व राजवीर हर दिन भगवान शिव की पूजा करने के लिए तरघड़िया भूमि पर आते थे।

इंद्र के गंधर्व राजवीर, राजलदे से बहुत प्रेम करते थे। राजवीर ने उन्हें मिलने के लिए जमीन के नीचे पाताल में ‘अमरावती’ नामक एक नगरी बनाई। उस नगरी में वे रोज़ भगवान शिव की शिवलिंग की पूजा करने आते थे।

जब राजवीर, राजलदे और साजलदे के साथ पूजा करके धरती पर लौटते, उसी समय श्रीबाई माताजी ब्रह्मकाल में सेवा पूजा कर रही थीं और राजवीर, राजवीर और सजलदे मिले। वे एक-दूसरे को जानकर बहुत आनंदित हुए। श्रीबाई माताजी ने कहा, “आज दोपहर में प्रसाद लेकर हम सब मिलकर समय बिताएँ।”

राजवीर, राजलदे और साजलदे ने माताजी का सम्मान किया और दोपहर में उनके साथ बैठकर भोजन किया। श्रीबाई माताजी ने कहा, “मेरा नियम है कि मैं रोज़ रात में रामायण पढ़ूँ। आप तीनों रोज़ इसे सुनने आएँ। लेकिन ध्यान रहे, हमें सोनलपरी नगरी जाना है, जहाँ हिरण्यकशिपु का शासन है और वहाँ राम नाम लेने पर रोक है। इसलिए सोच-समझकर आएँ।”

इस प्रकार चर्चा करके भोजन करने के बाद सभी अपने-अपने मार्ग पर चले गए। इसके बाद श्रीबाई माताजी सोनलपरी नगरी पहुँचीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने हिरन नदी के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी बनाई और वहीं निवास करके अपना जीवन यापन करने लगीं।

सोनलपरी नगरी में रामनाम लेने पर प्रतिबंध था, इसलिए श्रीबाई माताजी ने भूमि के भीतर गुप्त तहखाना(भूमिगत कक्ष) बनवाए, जहाँ वे प्रतिदिन रामायण का पाठ करती थीं।

श्रीबाई माताजी की रामायण सुनने के लिए राजलदे बिल्ली का रूप धारण करके आती थीं और राजवीर बिलाव बनकर श्रीबाई माताजी के आंगन में बैठते थे।

उस समय हिरण्यकशिपु बारह वर्षों के सिद्धि योग का तप करने गया हुआ था। सोनलपरी नगरी की राजगद्दी पर उसका पुत्र प्रह्लाद बैठकर राज्य का संचालन कर रहा था।

प्रह्लाद की माता कयाधु पाताल लोक की नाग कन्या थी और साजलदे उसकी माता की दासी हुमली बनकर नगर में रहती थी।

प्रतिदिन रात को जब श्रीबाई माताजी रामायण पढ़ती थीं, तो प्रकाश के लिए बिल्ली के सिर पर दीपक रखकर पाठ करती थीं। राजलदे बिल्ली के रूप में रामायण सुनती थीं। यह क्रम प्रतिदिन का नियम बन गया था।

एक समय प्रह्लाद को धर्म के मार्ग पर लाने के लिए श्रीबाई माताजी और राजलदे ने दासी हुमली से कहा कि वह प्रह्लाद को यह बात बताए।

उस समय प्रह्लाद अपने राजमहल में सो रहा था। दासी हमली ने उसे जगाकर कहा – “हे प्रह्लाद राजन! हमारे राज्य में रामनाम पर प्रतिबंध है, फिर भी सोनलपरी नगरी में हिरन नदी के तट पर प्रजापति श्रीबाई माता प्रतिदिन रात को रामायण पढ़ती हैं और हरिगुण गाती हैं।”

यह सुनकर प्रह्लाद चौंक उठा। उसी रात वह अपने सैनिकों के साथ श्रीबाई माताजी की झोपड़ी के पीछे छिपकर खड़ा हो गया कि जैसे ही वे रामायण पढ़ेंगी, उन्हें पकड़कर दंड देगा।

उसी समय आकाश मार्ग से राजवीर और राजलदे वहाँ आए और आते ही मिंदड़ी व मिंदड़ो का रूप धारण कर लिया। राजवीर आंगन में बैठ गया और राजलदे तहखाना में रामायण सुनने चली गई।

श्रीबाई माताजी बिल्ली के सिर पर दीप रखकर रामायण पढ़ने लगीं। थोड़ी देर बाद दीप गिर गया और बिल्ली रोने लगी।

इतने में कुछ देर बाद वह बिल्ली अपने बच्चों को इधर-उधर ढूँढते हुए करुण स्वर में चिल्लाने लगी। उसकी व्याकुलता और पीड़ा देखकर श्रीबाई (श्रीयादे) माता का हृदय द्रवित हो उठा। तब उन्होंने अपने पति श्री उडनकेशरी जी से निवेदन करते हुए पूछा – “वह कच्चा मटका कहाँ है, जिसमें इस बिल्ली ने अपने बच्चे दिए थे?”

तभी घर से उड़नभगत ने कहा – “वह मटका तो मुझसे भूलवश भट्टी में पकाने के लिए रख दिया गया है और उसमें अग्नि भी प्रज्वलित कर दी गई है। अब तो आधे से अधिक बर्तन पक चुके हैं।”

यह सुनकर श्रीबाई माताजी ने बिल्ली को गोद में बैठाकर प्रेम से समझाया—
“हे बिल्ली! चिंता मत कर। मेरे राम, श्रीहरि विष्णु नारायण तेरे बच्चों की रक्षा करेंगे।”

श्रीबाई माताजी के ये शब्द प्रह्लाद के कानों में पड़ गए। वह तुरंत सामने आकर बोला—
“हे माता! मुझे बताइए, राम कौन हैं? नहीं तो आपको राज्य में दंड मिलेगा।”

श्रीबाई माताजी बोलीं—
“प्रह्लाद! मेरा राम तो कण-कण में रम रहा है। यदि देखना है, तो कल सुबह आना।”

प्रह्लाद ने झोपड़ी के चारों ओर पहरा लगवा दिया।

रात में श्रीबाई माताजी, उड़नभगत, राजवीर और राजलदे ने मिलकर परमात्मा विष्णु नारायण की आराधना की।

सुबह होते ही प्रह्लाद आंगन में आया और बोला—
“मुझे आपका राम दिखाइए, नहीं तो आपको सूली की सजा दी जाएगी।”

श्रीबाई माताजी ने श्रीहरि विष्णु का स्मरण करते हुए बर्तनों की भट्टी खोलना प्रारंभ किया। भट्टी से एक-एक कर बर्तन निकालते हुए जब उस मटके की बारी आई, जिसमें बिल्ली के बच्चे थे, तो राजकुमार ने देखा कि वह मटका बिल्कुल कच्चा है। उसी क्षण उस मटके से बिल्ली के बच्चे हर्षोन्मत होकर जीवित बाहर निकल आए।

यह अद्भुत चमत्कार देखकर प्रह्लाद श्रीबाई माताजी के चरणों में गिर पड़ा और उन्हें अपना गुरु मान लिया। उन्होंने प्रह्लाद को महाधर्म का अधिकारी बना दिया।

तब परमात्मा विष्णु नारायण श्रीबाई माताजी पर प्रसन्न हुए और वरदान दिया—

“धन्य है तुम्हारी भक्ति। अब से प्रत्येक देवी-देवता के नाम के आगे ‘श्री’ शब्द लगेगा।”

इस प्रकार श्रीबाई माताजी का महान प्रागट्य हुआ।

प्रजापति समाज की आराध्य देवी: श्रीबाई माताजी जयंती

प्रजापति समाज अपनी आराध्य देवी, जीव-दया की साक्षात प्रतिमूर्ति पूज्य श्री श्रीयादे माताजी की जयंती हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाता है। माता के प्रागट्य और दिव्य कृपा की स्मृति में यह पर्व हर वर्ष माघ माह की शुक्ल द्वितीया को विशेष भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जयंती मनाने की परंपरा थोड़ी भिन्न दिखाई देती है। राजस्थान और गुजरात में इसे माघ सुदी दूज को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, वहीं मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इसे होलिका दहन के सात दिन बाद शीतला सप्तमी के दिन माता स्मरण दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है।

शीतला सप्तमी के दिन भक्त माता की स्मृति में पूजा-अर्चना करते हैं, उनके आदर्शों का अनुसरण करते हैं और उनके जीवन के शिक्षापरक प्रसंगों को याद करते हैं। कुछ समुदायों में इसे जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिससे यह पर्व केवल उत्सव ही नहीं, बल्कि भक्ति और श्रद्धा का जीवंत प्रतीक बन जाता है।

तालाला श्रीबाई माताजी धाम: भव्य पंचधातु घंट और मंदिर निर्माण

तालाला गीर में हाल ही में तैयार हुए श्रीबाई माताजी के नूतन मंदिर (श्रीबाई धाम) का भव्य त्रिदिवसीय प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव 20 से 22 फरवरी 2024 के बीच आयोजित किया गया। इस दिव्य मंदिर में माताजी को बिराजमान करने के कार्यक्रम के अंतर्गत 20 फरवरी को शोभायात्रा और 22 फरवरी को महासम्मेलन का आयोजन किया गया।

तालाला धाम में यह प्राण प्रतिष्ठा 22 फरवरी को आयोजित की गई, जो अयोध्या के राममंदिर में रामलल्ला की स्थापना के ठीक एक महीने बाद का विशेष अवसर है। इस दिन धाम में भक्तों और स्थानीय समाज के लोगों के लिए उत्सव का माहौल बना रहा।

धाम में इस अवसर पर 4000 किलोग्राम वजनी पंचधातु का भव्य घंट स्थापित किया गया, जो राजकोट में तैयार किया गया था। इस घंट की लंबाई और चौड़ाई लगभग 7 से 8 फीट है और इसे बनाने में किसी भी प्रकार का सिमेंट या लोहे का उपयोग नहीं किया गया है। इसकी कलात्मक कारीगरी सच्चे मंदिर निर्माण की परंपरा को दर्शाती है और इसे वर्ल्ड गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान दिया गया है।

इस भव्य घंट और धाम का मुख्य उद्घाटन डिजिटल माध्यम से किया गया। धाम के विकास के लिए लगभग 16 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। इस निवेश के अंतर्गत प्रदर्शन हॉल, श्रीबाई कूंड, भजनालय, गौशाला और धर्मशाला जैसी सुविधाओं का निर्माण किया गया है।

तालाला धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक गौरव को संरक्षित करने का प्रतीक भी है। इस धाम और पंचधातु घंट के माध्यम से गुजरात धार्मिक पर्यटन और आध्यात्मिक गतिविधियों के क्षेत्र में भी नया मुकाम हासिल कर रहा है।