
श्री हरि स्तोत्रम्, जिसे हरि स्तुति भी कहा जाता है, भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। भगवान हरि को सृष्टि के पालनकर्ता, धर्म की रक्षा करने वाले और अधर्म का नाश करने वाले परमेश्वर के रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु के दिव्य गुणों, करुणा और अनंत शक्ति का सुंदर वर्णन करता है।
इस स्तोत्र में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों—जैसे श्री राम, श्री कृष्ण, नृसिंह और वामन—की महिमा का गुणगान किया गया है। यह दर्शाता है कि जब-जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान हरि अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं।
श्री हरि स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करने से मानसिक शांति, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, भक्ति की वृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र भक्तों के मन में ईश्वर के प्रति समर्पण, विश्वास और वैराग्य की भावना को जागृत करता है।
यह स्तोत्र विशेष रूप से एकादशी, वैकुण्ठ एकादशी, जन्माष्टमी और भगवान विष्णु की पूजा के समय अत्यंत फलदायी माना जाता है। नियमित जाप से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति व आध्यात्मिक उन्नति होती है।
लिरिक्स – श्री हरि स्तोत्रम्
जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालंशरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं ।
नभोनीलकायं दुरावारमायंसुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं॥ १ ॥
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासंजगत्सन्निवासं शतादित्यभासं ।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रंहसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं ॥ २ ॥
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारंजलान्तर्विहारं धराभारहारं ।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपंध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं ॥ ३ ॥
जराजन्महीनं परानन्दपीनंसमाधानलीनं सदैवानवीनं ।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुंत्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं ॥४ ॥
कृताम्नायगानं खगाधीशयानंविमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं ।
स्वभक्तानुकूलं जगद्व्रुक्षमूलंनिरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं ॥ ५ ॥
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशंजगद्विम्बलेशं ह्रुदाकाशदेशं ।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहंसुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं ॥ ६ ॥
सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठंगुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं ।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरंमहाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं ॥ ७ ॥
रमावामभागं तलानग्रनागंकृताधीनयागं गतारागरागं ।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतंगुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं ॥ ८ ॥
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तंपठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारे: ।
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकंजराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥ ९ ॥


