
श्री शिव रामाष्टकस्तोत्रम् भगवान शिव और भगवान श्रीराम की संयुक्त महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र एवं प्रभावशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र में कुल आठ श्लोक हैं, जिनमें भगवान शिव के करुणामय, कल्याणकारी स्वरूप और भगवान राम के आदर्श, मर्यादित एवं धर्मपरायण चरित्र की स्तुति की गई है। यह स्तोत्र शिव और राम—दोनों की दिव्य शक्तियों को एक साथ स्मरण करने का अद्भुत माध्यम है।
इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, मानसिक शांति, भय से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। भगवान शिव को संहारक और कल्याणकर्ता के रूप में तथा भगवान राम को आदर्श राजा, पुत्र और मानवता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके प्रत्येक श्लोक में भक्ति, श्रद्धा और शक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
श्री शिव रामाष्टकस्तोत्रम् का नियमित जाप विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि, राम नवमी और अन्य शुभ अवसरों पर अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसकी सरल, लयबद्ध और काव्यात्मक रचना इसे गाने और याद करने में सहज बनाती है।
यदि आप जीवन में शांति, धर्म, साहस, भक्ति और ईश्वर की कृपा चाहते हैं, तो श्री शिव रामाष्टकस्तोत्रम् का श्रद्धा से पाठ अवश्य करें।
लिरिक्स – श्री शिव रामाष्टकस्तोत्रम्
शिवहरे शिवराम सखे प्रभो,त्रिविधताप-निवारण हे विभो।
अज जनेश्वर यादव पाहि मां,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥ १ ॥
कमल लोचन राम दयानिधे,हर गुरो गजरक्षक गोपते।
शिवतनो भव शङ्कर पाहिमां,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ २ ॥
स्वजनरञ्जन मङ्गलमन्दिर,भजति तं पुरुषं परं पदम्।
भवति तस्य सुखं परमाद्भुतं,शिवहरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ३ ॥
जय युधिष्ठिर-वल्लभ भूपते,जय जयार्जित-पुण्यपयोनिधे ।
जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तुते,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ४ ॥
भवविमोचन माधव मापते,सुकवि-मानस हंस शिवारते ।
जनक जारत माधव रक्षमां,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ५ ॥
अवनि-मण्डल-मङ्गल मापते,जलद सुन्दर राम रमापते ।
निगम-कीर्ति-गुणार्णव गोपते,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ६ ॥
पतित-पावन-नाममयी लता,तव यशो विमलं परिगीयते ।
तदपि माधव मां किमुपेक्षसे,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ७ ॥
अमर तापर देव रमापते,विनयतस्तव नाम धनोपमम् ।
मयि कथं करुणार्णव जायते,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ८ ॥
हनुमतः प्रिय चाप कर प्रभो,सुरसरिद्-धृतशेखर हे गुरो ।
मम विभो किमु विस्मरणं कृतं,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ ९ ॥
नर हरेति परम् जन सुन्दरं,पठति यः शिवरामकृतस्तवम् ।
विशति राम-रमा चरणाम्बुजे,शिव हरे विजयं कुरू मे वरम् ॥ १० ॥
प्रातरूथाय यो भक्त्या पठदेकाग्रमानसः ।
विजयो जायते तस्य विष्णु सान्निध्यमाप्नुयात् ॥ ११ ॥
॥ इति श्रीरामानन्दस्वामिना विरचितं श्रीशिवरामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥


