
माँ महागौरी, देवी दुर्गा का आठवां स्वरूप, अपनी पवित्रता, शांत स्वभाव और करुणा के लिए पूजी जाती हैं। शांति और बुद्धिमत्ता का प्रतीक, उन्हें अक्सर सफेद तेजस्वी रूप में दर्शाया जाता है, जो सफेद बैल पर सवार होती हैं। उनकी चार भुजाएँ उनके दिव्य शक्तियों का प्रतीक हैं: त्रिशूल और डमरु धारण करना और अभयमुद्रा में आशीर्वाद देना, जो निर्भयता का संकेत है।
भक्त विशेष रूप से नवरात्रि के दुर्गा अष्टमी के अवसर पर महागौरी की पूजा करते हैं, और उनके आशीर्वाद से आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति की कामना करते हैं। उनका दिव्य स्वरूप शांति और सुरक्षा का अनुभव कराता है, और उन्हें स्नेह और पालनहार के रूप में माना जाता है। महागौरी की पूजा से विचारों और कर्मों में पवित्रता लाने की प्रेरणा मिलती है, जो उन्हें हिंदू धर्म और आध्यात्मिकता में प्रिय बनाता है।
नवरात्रि का आठवां दिन: महागौरी की महिमा
नवरात्रि के आठवें दिन, जिसे दुर्गा अष्टमी या महाअष्टमी कहा जाता है, मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महागौरी देवी को पवित्रता, शांति और करुणा की देवी माना जाता है। उनकी छवि अत्यंत शांत, पवित्र और श्वेत है। “महा” का अर्थ है अत्यंत और “गौरी” का अर्थ है श्वेत।
महागौरी के अन्य नाम
महागौरी के सभी वस्त्र और आभूषण श्वेत होते हैं, इसी कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा जाता है। उनकी आयु को आठ वर्ष की बालिका के रूप में माना गया है, इसी कारण उन्हें “अष्टवर्षा भवेद् गौरी” कहा जाता है।
महागौरी का दिव्य स्वरूप
महागौरी का वर्ण अत्यंत गोरा है, जिसे शंख, चंद्र और कुंद के फूल के समान उज्ज्वल कहा गया है। उनकी आयु को आठ वर्ष का माना जाता है, इसीलिए उन्हें “अष्टवर्षा भवेद् गौरी” कहा गया है। महागौरी के वस्त्र और आभूषण भी पूरी तरह से श्वेत होते हैं, जो उनकी पवित्रता और दिव्यता को और भी अधिक प्रकट करते हैं।
उनकी चार भुजाएँ हैं, और उनका वाहन वृषभ है। महागौरी के दाहिने ओर ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा है, जो भक्तों को भयमुक्त करती है, जबकि नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है, जो उनकी शक्ति का प्रतीक है। बाएँ ओर ऊपर वाले हाथ में डमरू है, जो सृजन और विनाश का संकेत देता है, और नीचे वाले बाएँ हाथ में वर-मुद्रा है, जो भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा है।
महागौरी की आकृति अत्यंत शांत और शीतल है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना पर वह हिमालय की श्रृंखलाओं में शाकंभरी देवी के रूप में प्रकट हुई थीं, जो समस्त सृष्टि के कल्याण हेतु आई थीं।
माँ महागौरी के दिव्य रूप की अद्भुत कथाएँ
महागौरी के नाम से जुड़ी दो प्रसिद्ध और रोचक कथाएँ हैं, जो उनके दिव्य रूप को उजागर करती हैं। पहली कथा के अनुसार, जब आदिशक्ति पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया, तो उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने इतनी कठोर तपस्या की कि उनका शरीर काला पड़ गया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और उनके शरीर को गंगा जल से धोया। गंगा जल के स्पर्श से देवी का शरीर विद्युत के समान कांतिमय हो गया और उनका गौर वर्ण प्रकट हुआ। इसी कारण से उन्हें “गौरी” कहा जाने लगा
दूसरी कथा कालरात्रि के रूप से जुड़ी है। जब देवी पार्वती ने शुंभ और निशुंभ नामक दैत्यों का नाश करने के लिए एक भयानक रूप धारण किया, जिसमें उनका रंग अंधकार की तरह काला हो गया। इस डरावने रूप के कारण उन्हें “कालरात्रि” कहा गया। इस रूप में उन्होंने शुंभ-निशुंभ और उनकी विशाल सेना को पराजित कर दिया और देवताओं को फिर से स्वर्ग का अधिकार दिलाया।
जब देवी कालरात्रि अपने कार्य को पूर्ण कर कैलाश पर अपने पति भगवान शिव के पास लौटीं, तो शिवजी ने उनकी काली त्वचा को देखकर उन्हें उपहास में “काली” कहकर संबोधित किया। यह सुनकर देवी ने सोचा कि उनका यह रूप केवल राक्षसों का विनाश करने के लिए था, और अब उन्हें अपने सुंदर स्वरूप में लौट जाना चाहिए। उन्होंने अपनी काली त्वचा को त्यागने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हुईं।
अंततः उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या करने का निश्चय किया ताकि वह उन्हें इसका समाधान बता सकें। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें मानसरोवर झील में स्नान करने का सुझाव दिया। देवी ने ऐसा ही किया, और स्नान के बाद उनकी पूर्व की उज्ज्वल श्वेत त्वचा वापस लौट आई। इसी कारण उन्हें “कौशिकी” कहा गया।
एक बार देवी कौशिकी ने एक दिव्य नदी में स्नान किया, जिससे उनकी त्वचा और भी अधिक कांतिमान हो गई, और इसी कारण उनका नाम “महागौरी” पड़ा। महागौरी का यह स्वरूप शांति, पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक है, जो उनके श्वेत वर्ण से प्रकट होता है।
कैसे सिंह बना देवी महागौरी का दिव्य वाहन?
महागौरी से जुड़ी एक अन्य कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि जब देवी उमा (पार्वती) भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं, तब एक भूखा सिंह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा। देवी को तपस्या करते हुए देखकर उसकी भूख और भी बढ़ गई, लेकिन उसने धैर्य रखा और देवी के तप से उठने का इंतजार करने लगा। इस इंतजार में सिंह इतना कमजोर हो गया कि वह वहां बैठा-बैठा धीरे-धीरे तपस्वी जैसा लगने लगा।
जब देवी उमा ने अपनी तपस्या पूरी की और अपनी आंखें खोलीं, तो उन्होंने सिंह की दयनीय हालत देखी। सिंह की इस धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा और उसके समर्पण को देखकर देवी को उस पर दया आ गई। उन्होंने उसे अपनी सवारी बनाने का निर्णय लिया, क्योंकि एक प्रकार से सिंह ने भी तपस्या जैसी साधना की थी। इसलिए, देवी महागौरी का वाहन केवल वृषभ (बैल) ही नहीं, बल्कि सिंह भी माना जाता है।
माँ महागौरी का प्रिय रंग और फूल
माँ महागौरी को सफेद रंग बेहद प्रिय है, और उनका प्रिय फूल मोगरा है। इस दिन की पूजा में मोगरे के फूलों का शामिल होना बहुत शुभ माना जाता है।
माँ महागौरी का प्रिय भोग
माँ महागौरी का प्रिय भोग नारियल है, इसलिए अष्टमी के दिन नारियल से बना भोग जैसे नारियल की बर्फी या लड्डू चढ़ाना बहुत शुभ माना गया है।
महागौरी का मंत्र
ॐ देवी महागौर्यै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ||


