
संत चोखामेला जी की कथा भक्ति, प्रेम और परम विश्वास का अद्भुत उदाहरण है। 13–14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में जन्मे चोखामेला जी दलित परिवार से थे। इसी कारण समाज ने उनके साथ भेदभाव किया और उन्हें मंदिर में प्रवेश तक नहीं करने दिया। लेकिन सच्ची भक्ति के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती।
कहानी है कि जब चोखामेला जी प्रेमपूर्वक भगवान विठ्ठल को प्रसाद चढ़ाना चाहते थे, तो उन्हें रोका गया और समाज ने उन्हें दंडित भी किया। परंतु भगवान अपने सच्चे भक्त से दूर कैसे रह सकते हैं? कहा जाता है कि स्वयं भगवान विठ्ठल उनके सामने प्रकट हुए, उनकी गोद में बैठकर केले खाए और उनके घावों पर मरहम लगाया।
यह प्रसंग न केवल एक संत की अतुलनीय भक्ति को दर्शाता है बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर का प्रेम हृदय की पवित्रता को देखता है, जाति या सामाजिक स्थिति को नहीं। आज पंढरपुर के श्री विठ्ठल मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थित चोखामेला जी की समाधि इसी दिव्य प्रेम की याद दिलाती है।
आइए, इस प्रेरक कथा को विस्तार से जानें!
महाराष्ट्र की धरती पर कई महान संतों ने जन्म लिया, और उनमें से एक थे संत चोखामेला। जिस तरह उत्तर भारत में संत रविदास जी की महिमा गाई जाती है, उसी तरह महाराष्ट्र में संत चोखामेला का विशेष स्थान है।
पंढरपुर की पावन धरती पर एक ऐसे संत हुए, जिनका जन्म किसी साधारण माता के गर्भ से नहीं, बल्कि स्वयं भगवान पंढरीनाथ की कृपा से हुआ। उनका नाम था चोखामेला।
संत चोखामेला कौन थे?
संत चोखामेला 13वीं–14वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के ऐसे संत थे, जिनका जीवन भक्ति, प्रेम और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का जीवंत उदाहरण है। वह महार जाति में जन्मे थे, जिसे उस समय समाज की सबसे निम्न जातियों में गिना जाता था।
उनका जन्म बुलढाणा जिले के देउलगाँव राजा तालुका के छोटे से गाँव मेहुना राजा में हुआ था। बाद में वे महाराष्ट्र के मंगलवेढ़ा में रहने लगे। अपनी सरलता और भक्ति से प्रेरित होकर चोखामेला जी ने कई अभंग लिखे, जिनमें प्रसिद्ध अभंग “अबीर गुलाल उडलीत रंग” आज भी भक्ति का अमृत बरसाता है।
आज देउलगाँव राजा में सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद प्रभाकर कायंदे द्वारा आयोजित “चोखामेला महोत्सव” उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए है। संत चोखामेला को भारत के सबसे प्रारंभिक निम्न जाति के कवि-संतों में से एक माना जाता है।
चोखामेला का परिवार और जीवन संघर्ष
चोखामेला अपनी पत्नी सोयराबाई और बेटे कर्ममेला के साथ मंगलवेढ़ा में रहते थे। उनकी बहन का नाम निर्मला था, और निर्मला के पति बांका थे। उनका पूरा परिवार वारकरी संप्रदाय का अनुयायी था।
हालाँकि चोखा का जीवन बाहर से बहुत साधारण था—वे ऊँची जाति के खेतों की रखवाली और मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे।
नामदेव जी से दीक्षा – भक्ति की राह
कहा जाता है कि एक बार चोखामेला जी पंढरपुर गए। वहाँ उन्होंने संत नामदेव का कीर्तन सुना — और उसी क्षण उनका हृदय बदल गया। पहले से ही विठोबा के भक्त चोखा, नामदेव के शब्दों से इतनी गहराई से प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपना गुरु मान लिया और भक्ति के मार्ग पर दीक्षित हो गए।

भगवान का लीला रूप – चोखामेला का जन्म
एक समय की बात है, पंढरपुर में एक ब्राह्मण दंपति निवास करता था। वे परम भक्त थे और प्रत्येक एकादशी को श्री पंढरीनाथ के दर्शन हेतु मंदिर जाया करते थे। उनकी भक्ति सच्ची थी, लेकिन वे निःसंतान थे।
एक दिन उन्होंने सोचा, “आज जब भगवान के दर्शन को जाएंगे, तो उनके भोग के लिए मीठे-मीठे आम लेकर चलेंगे।” वे आम लेकर मंदिर की ओर बढ़ चले, पर भगवान भक्तों के प्रेम को सहन नहीं कर सकते। वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे!
भगवान ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और मंदिर के बाहर ही उन भक्तों से कहा, “मुझे बहुत भूख लगी है, कृपया मुझे दो-तीन आम दे दीजिए।”
वे दंपति विनम्र थे, उन्होंने श्रद्धा से आम दे दिए। लेकिन जैसे ही उन्होंने आम दिए, वह ब्राह्मणरूपधारी बालक उन आमों को थोड़ा-थोड़ा चूसकर ब्राह्मणी की गोद में डालने लगा। यह देखकर दंपति चकित रह गए।
आगे बढ़ते समय ब्राह्मणी को झोली कुछ भारी लगी। जब वे भगवान को भोग लगाने के लिए मंदिर पहुंचे, तो सोचा, “जो आम इस ब्राह्मण ने छोड़े हैं, उन्हें किसी पशु-पक्षी को खिला देंगे।” परन्तु जैसे ही उन्होंने अपनी झोली खोली, वे आश्चर्यचकित रह गए! उसमें एक नन्हा सा, तेजस्वी नवजात बालक मुस्कुरा रहा था।
भगवान ने उन्हें एक दिव्य संतान दी थी, परंतु समाज के भय से ब्राह्मणी विचलित हो गई। “अगर मैं इस बालक को घर ले गई, तो लोग क्या कहेंगे? वे मेरी बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि यह भगवान का प्रसाद है!”
ब्राह्मणी भयभीत हो गईं और उन्होंने बालक को एक वृक्ष के नीचे छोड़ दिया।

एक दलित परिवार ने लिया चोखामेला को गोद
थोड़ी देर बाद, एक चर्मकार(चमड़े का काम करने वाले) दंपति, जो संतानहीन थे, वहाँ से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा, वृक्ष के नीचे एक सुंदर बालक रो रहा था। उनके मन में दया जागी, उन्होंने उसे प्रेमपूर्वक गोद लिया और भगवत-प्रसाद मानकर उसका पालन-पोषण किया। चूंकि यह परिवार महार जाति से था, इसलिए चोखा मेला का पालन-पोषण उसी जाति में हुआ।

विठ्ठल प्रेम में लीन संत चोखा मेला
संत चोखा मेला का जीवन कठिनाइयों से भरा था। मेहनत-मजदूरी कर वे अपना जीवनयापन करते, लेकिन उनका मन हमेशा भजन-कीर्तन में ही लगा रहता। उनका हृदय भगवान विट्ठल की भक्ति से सराबोर था। जब भी अवसर मिलता, वे श्री विठोबा के दर्शन के लिए पंढरपुर जाया करते थे।
पंढरपुर में उन्होंने संत नामदेव जी के कीर्तन सुने, जिससे उनकी भक्ति और गहरी हो गई। उन्होंने नामदेव जी को अपना गुरु माना और अपने दैनिक कार्यों के साथ-साथ भगवान के नाम में लीन रहने लगे।
एक बार, जब उन्हें मजदूरी में कुछ अधिक पैसे मिले, तो उन्होंने केले खरीदे और उनके मन में विचार आया, “क्यों न इन्हें प्रसाद के रूप में अपने ठाकुर जी को अर्पित करूं?” वे श्रद्धा से केले लेकर मंदिर की ओर चल पड़े। लेकिन जैसे ही वे मंदिर में प्रवेश करने लगे, पुजारियों ने रोक दिया, “तुम्हारी जाति नीची है, तुम मंदिर में नहीं आ सकते!”
चोखा मेला की भक्ति इतनी गहरी थी कि वे इन बातों से विचलित नहीं हुए। वे प्रेमपूर्वक भगवान के द्वार तक बढ़ते गए। परंतु समाज ने उन्हें दंडित किया। उन्हें बेरहमी से पीटा गया, उनके वस्त्र फाड़े गए, और मंदिर से बाहर निकाल दिया गया।

भक्त की पुकार पर भगवान का प्रत्यक्ष प्रकट होना
शाम को चोखा मेला अपने घाव धो रहे थे और रोते हुए भगवान से कह रहे थे, “हे प्रभु! मैंने आपसे कुछ नहीं मांगा, केवल फल अर्पित करने आया था। लेकिन लोगों ने मुझे इतना मारा कि अब मैं कभी नहीं आऊंगा!”
उसी क्षण, भगवान श्री पंढरीनाथ नीलवर्ण, पीतांबर धारण किए, मंद-मंद मुस्कुराते हुए उनके पास प्रकट हुए। उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा, “हे चोखा! क्यों उदास हो?”
चोखामेला भावविभोर हो गए, बोले, “उदास? “पहले तो अपने पुजारियों से पिटवाया, और आप अब पूछ रहे हैं?”
भगवान मुस्कुराए, “वे लोग मुझे पत्थर समझते हैं, मैं उनके लिए बोलता नहीं। पर तू मुझे सजीव मानता है, इसलिए मैं तेरे पास स्वयं आया हूँ। चल, अपने हाथों से मुझे फल खिला।”
भगवान ने अपने हाथों से चोखामेला की चोटों पर मरहम लगाया और फिर उनकी गोद में बैठकर केले खाए। उन्होंने कुछ केले अपनी पीतांबर में बांध लिए। चोखा मेला ने आश्चर्य से पूछा, “गठबंधन क्यों कर रहे हो?”

भगवान बोले, “रुक्मिणी भी भूखी हैं। जब मेरे भक्तों का अपमान होता है, तो मैं स्वयं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करता। आज मैं तुम्हारे साथ अन्याय होते देख दुखी था, इसलिए मैंने मंदिर में कुछ भी नहीं खाया। ये केले रुक्मिणी के लिए ले जा रहा हूं।” भगवान प्रेम से वह प्रसाद लेकर पंढरपुर लौटे।
अगली सुबह, जब मंदिर के द्वार खुले, तो पुजारियों ने देखा कि मंदिर में केले के छिलके बिखरे पड़े थे! “रात को मंदिर बंद था, यह केले के छिलके यहाँ कैसे आए?”
किसी ने कहा, “वही चर्मकार चोखो मेला कल मंदिर में घुसना चाहता था, निश्चित ही वह चोरी-छिपे अंदर आ गया होगा!” पुजारियों ने क्रोधित होकर फिर चोखा मेला को पकड़कर पीटा।

लेकिन इस बार भगवान क्रोधित हो गए! जैसे ही चोखा मेला पर अत्याचार हुआ, मंदिर के सभी दरवाजे अपने आप बंद हो गए!
तभी मंदिर के भीतर से भगवान का स्वर आया – “तुम लोग स्वयं को ज्ञानी और ब्राह्मण समझते हो, लेकिन मेरे सच्चे भक्त का अपमान करते हो! अब यह द्वार तब तक नहीं खुलेगा जब तक तुम चोखा मेला को सम्मानपूर्वक बुलाकर, उन्हें पालकी में विराजित कर यहां नहीं लाते।”
पुजारियों ने अपनी भूल स्वीकार की। अब वे सभी वेदपाठी ब्राह्मण, जो कल तक उन्हें अपवित्र मानते थे, एक दिव्य सिंहासन पर चोखा मेला को बैठाकर, पूरे नगर में पालकी यात्रा निकाली। “जय हो चोखा मेला जी की!” नाचते-गाते हुए, जब वे उन्हें भगवान के द्वार तक लाए, तो स्वयं ही मंदिर के पट खुल गए।
चोखामेला के परिवार की भक्ति
चोखामेला के परिवार में भी भक्ति का भाव गहरा था। उनकी पत्नी सोयराबाई और बहन निर्मलाबाई भी भक्त थीं। कहा जाता है कि जब सोयराबाई प्रसूति पीड़ा में थीं, तब स्वयं भगवान विठ्ठल उनकी सेवा में उपस्थित हुए। उनके पुत्र कर्म मेला और उनके साले बांका महार भी विठ्ठल भक्त थे। चोखा जी की भक्ति इतनी प्रबल थी कि वे अक्सर कहते— “भगवान के नाम की शक्ति से मेरे सारे दुख नष्ट हो गए। इसी जीवन में मैंने भगवान से साक्षात्कार कर लिया!”
पंढरपुर में संत चोखामेला की समाधि
एक दिन, मंगलवेढ़ा गाँव की दीवार की मरम्मत का कार्य चल रहा था, जिसमें चोखामेला भी लगे हुए थे। अचानक, दीवार गिर गई और कई मजदूरों के साथ चोखा जी भी मलबे में दब गए। सन् 1338 ईस्वी में, उनका देहावसान हो गया।
लेकिन उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि जब संत नामदेव जी उनकी अस्थियों को खोजने गए, तो उन्होंने एक अद्भुत तरीका अपनाया। वे अस्थियों को उठाते और कान लगाकर सुनते—जिस अस्थि से “विठ्ठल! विठ्ठल!” की ध्वनि आती, वही चोखामेला की मानी गई। उनकी अस्थियों को पंढरपुर ले जाया गया और श्री विठ्ठल मंदिर के महाद्वार पर उनका समाधि स्थल बनाया गया।
आज भी, संत चोखामेला की समाधि भक्तों के लिए आस्था और प्रेम का केंद्र बनी हुई है।


