
भक्त घाटम दास, जयपुर रियासत के एक अनोखे कवि-संत, बाद में “महात्मा घाटम दास” के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी अद्भुत कथा ‘भक्तमाल’ में वर्णित है, जो बताती है कि अपराधबोध की भावना ने उन्हें कैसे एक महान संत से मार्गदर्शन लेने के लिए प्रेरित किया। दूरी अधिक होने के कारण जब वे पैदल नहीं चल सके, तब घाटम दास ने एक साहसिक निर्णय लिया—उन्होंने राजमहल के अस्तबल से काला घोड़ा चुरा लिया ताकि संत के दर्शन कर सकें।
अद्भुत तो यह कि जैसे ही राजा के सैनिकों ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, घोड़ा उनके सामने ही काले से सफेद हो गया। इस चमत्कार ने सबको चकित कर दिया और घाटम दास को राजा का सम्मान मिला। राजा ने उन्हें एक आश्रम भी बनवाकर दिया, जो आज ‘घाटम घाट’ के नाम से जाना जाता है। आइए जानें कैसे एक चोर, ठाकुर जी (कृष्ण) की कृपा से महान संत बनने की राह पर चल पड़ा—यह कहानी हमें मोक्ष, परिवर्तन और अटूट भक्ति की शक्ति का संदेश देती है।

घाटम दास का जीवन: चोरी एक पारिवारिक पेशा
घाटम दास जी, मीणा जाति के एक मशहूर चोर थे, जयपुर के पास खेड़ी गांव में रहते थे। चोरी करना, लूटपाट करना और डाका डालना उनका पारिवारिक व्यवसाय था। पीढ़ियों से उनके पूर्वज यही करते आ रहे थे, और घाटम जी भी अपने पूर्वजों के रास्ते पर चलते हुए चोरी किया करते थे।
उनके पिता ने मरते समय अपने पुत्रों को बुलाया और अंतिम सलाह दी। “बेटा, सुनो। मेरी एक बात मान लो और इसे हमेशा याद रखना। अगर तुम इसका पालन करोगे, तो तुम्हारा जीवन सुखी रहेगा।”
पुत्रों ने हाथ जोड़कर कहा, “पिताजी, बताइए, हम आपकी आखिरी बात जरूर मानेंगे।” पिता बोले, “देखो, भूलकर भी कभी कथा नहीं सुनना। जहाँ भी सत्संग हो रहा हो, साधु-महात्मा कीर्तन कर रहे हों, या कोई कथा चल रही हो, वहां मत जाना।”
पुत्रों ने हैरानी से पूछा, “कथा सुनने से क्या होगा, पिताजी?” पिता ने गंभीरता से कहा, “कथा सुनोगे तो चोरी नहीं कर पाओगे। हमारे परिवार का पेशा चोरी ही है, अगर तुम कथा सुनने लगे तो चोरी बंद हो जाएगी। और जब चोरी नहीं करोगे, तो घर में रोटी कैसे आएगी? इसलिए कथा से दूर रहना।”
उन्होंने पिताजी से यह भी पूछा था, “अगर कभी ऐसी स्थिति आ जाए कि पुलिस हमारे पीछे हो और भागने का कोई रास्ता न हो, तब क्या करें?” इस पर पिताजी ने कहा था, “उस स्थिति में कान में उंगली डाल लेना, ताकि एक भी शब्द कान में न पड़े।” पिता की यह सीख उनके बच्चों के दिल में बैठ गई। वे अपने पिता की बात मानते थे और सत्संग या कथा के आसपास भी नहीं फटकते थे। घाटम जी भी यही करते थे।

जब चोरी के रास्ते पर चुभा कांटा और सुनाई दी कथा
समय बीतता गया, और घाटम दास जी अपने डाकुओं के गिरोह के साथ चोरी और डाके डालते रहे। एक दिन, जब घाटम जी एक बड़ी चोरी के बाद भाग रहे थे, तो उनके पीछे पुलिस लगी हुई थी। वह भागते-भागते एक गांव के पास पहुंचे, जहां एक पेड़ के नीचे एक संत व्यास जी कथा सुना रहे थे और सैकड़ों लोग ध्यान से कथा सुन रहे थे।
घाटम जी ने सोचा, “अगर मैं यहां रुकता हूं, तो पुलिस मुझे पकड़ लेगी, और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है। भागने का यही एकमात्र रास्ता है।” लेकिन तभी उन्हें अपने पिताजी की बात याद आ गई – “कभी कथा मत सुनना।”
उन्होंने तुरंत अपने कानों में उंगली डाल ली और मन में कहा, “कथा नहीं सुनूंगा, कथा नहीं सुनूंगा।” यह कहते हुए वह भागने लगे। लेकिन जल्दबाजी में उनके पैर में एक कांटा चुभ गया, और वह दर्द से कराह उठे। कांटा इतना गहरा चुभा था कि बिना निकाले चलना मुश्किल हो गया। मजबूर होकर उन्होंने अपने कानों से उंगली निकाली और कांटा निकालने लगे।
इसी बीच कथा का एक वाक्य उनके कानों में पड़ा। व्यास जी उस वक्त बता रहे थे, “देवताओं की छाया नहीं होती, और उन्हें पसीना भी नहीं आता।” घाटम जी ने यह सुन लिया, लेकिन वह तुरंत वहां से भाग निकले। घर लौटने पर उन्हें महसूस हुआ कि वह कथा के कुछ शब्द सुन चुके हैं। इस बात से वह थोड़े चिंतित हुए, लेकिन उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

कैसे एक कथा ने घाटम दास की बचाई जान
कुछ समय बाद, राजा ने इन डाकुओं को पकड़ने के लिए एक योजना बनाई। राजा के मंत्री ने सुझाव दिया कि क्योंकि ये डाकू काली माता के भक्त हैं, तो एक नकली काली का रूप बनाकर उन्हें धोखा दिया जाए। योजना के अनुसार, एक व्यक्ति को काली का रूप दिया गया और जंगल के मंदिर में भेजा गया, जहां डाकू अक्सर पूजा करने आते थे।
जब घाटम जी और उनके साथी वहां पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि काली मां साक्षात प्रकट हो गई हैं। सभी डाकू प्रसन्न होकर उनकी पूजा करने लगे। लेकिन घाटम जी ने गौर से देखा और सोचा, “इनकी तो छाया पड़ रही है और इन्हें पसीना भी आ रहा है। हमने कथा में सुना था कि देवताओं की छाया नहीं होती और उन्हें पसीना नहीं आता। यह असली काली मां नहीं हो सकतीं।” घाटम जी को शक हो गया कि यह एक चाल है। वह धीरे से वहां से निकल गए।
थोड़ी देर बाद, राजा की सेना ने हमला किया और सभी डाकुओं को पकड़ लिया। उन्हें मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई, लेकिन घाटम जी बच गए। घर लौटकर घाटम जी ने सोचा, “अगर मैंने कथा के वे कुछ शब्द नहीं सुने होते, तो आज मैं भी पकड़ा जाता और मुझे भी फांसी हो जाती। मेरे प्राण तो कथा ने बचाए।अब मैं समझ गया हूं कि पिताजी की बात गलत थी। कथा सुनना जीवन का सबसे बड़ा कल्याण है।

घाटम जी को संत से मिले चार नियम
एक दिन की बात है, जब घाटम जी जयपुर से आमेर की ओर जा रहे थे। आमेर और जयपुर के बीच स्थित कनक घाटी में रात का घना अंधेरा फैला हुआ था। घाटम जी चोरी करने की योजना बना रहे थे, लेकिन उस रात उन्हें कोई अमीर व्यक्ति नहीं मिला। दो दिन से कुछ चुराया भी नहीं था, इसलिए मन ही मन बेचैन हो रहे थे।
इसी दौरान उन्होंने एक संत को देखा जो जटाएं बांधे, हाथ में झोला लिए हुए जा रहे थे। घाटम जी ने सोचा, “संत है, इसके पास क्या होगा चुराने के लिए?” फिर उन्होंने विचार किया, “चोरी तो नहीं करता, बस जाकर प्रणाम कर लेता हूं।” घाटम जी संत के रास्ते में आ गए और अर्धरात्रि के समय घने अंधेरे में उन्हें प्रणाम किया।
संत रुक गए और बोले, “खुश रहो वत्स। तुम्हारा नाम क्या है?” घाटम जी ने सत्य बोला, “मेरा नाम घाटम है, और मैं चोरी करता हूं।” संत ने हंसते हुए पूछा, “चोरी क्यों करते हो? यह तो अच्छा काम नहीं है।” घाटम जी ने उत्तर दिया, “महाराज, मैं जानता हूं कि यह अच्छा काम नहीं है, लेकिन यह मेरे पूर्वजों का पेशा है। मेरे परिवार में सभी यही काम करते हैं।”
संत ने थोड़ी देर सोचा और फिर बोले, “देखो, चोरी करना गलत है, लेकिन अगर तुम चोरी नहीं छोड़ सकते, तो मैं तुम्हें चार बातें सिखाता हूं। इनका पालन करना तुम्हारे जीवन में बदलाव लाएगा।” घाटम जी तैयार हो गए।
संत ने कहा, “पहली बात, हमेशा सत्य बोलना। दूसरी बात, संत जनों का सम्मान करना। तीसरी बात, जो भी लाओ, चाहे चोरी से या मेहनत से, पहले ठाकुर जी को अर्पित करना और फिर खुद खाना। चौथी बात, जब भी कोई मंदिर, मठ या संत दिखें, चाहे कितनी भी जल्दी में हो, रुककर प्रणाम करना।” घाटम जी ने संत जी को प्रणाम किया और जीवन भर उन चार बातों को पालन करने का वचन दिया।

एक चोर का संतों के प्रति प्रेम और समर्पण
घाटम जी चोरी-डकैती करके धन लाते, और सबसे पहले उस धन का उपयोग साधु-संतों की सेवा में करते थे। जो धन बचता, उससे अपने परिवार की देखभाल करते। कुछ समय बाद, घाटम जी ने देखा कि संतों की एक टोली उनके गांव से गुजर रही है। उन्होंने दौड़कर संतों को अपने घर बुलाया। लेकिन जब घर पहुंचे, तो पत्नी ने कहा, “हमारे पास तो खुद के लिए भी भोजन नहीं है, संतों को क्या खिलाएंगे?” घाटम जी ने सोचा, “गुरु की आज्ञा है, संतों की सेवा करनी है।”
घाटम जी बाज़ार पहुँचे और दुकानदारों से उधार माँगने लगे, पर किसी ने भी मदद नहीं की। तभी उनकी नज़र पास के खेतों पर पड़ी, जहाँ गेहूँ की कटाई हो रही थी और किसान सो रहे थे। उन्होंने मौके का फायदा उठाया और एक बड़ी चादर लेकर खेत से गेहूँ भर लाए। संतों के भोजन की व्यवस्था कर दी, लेकिन उनके भारी कदमों के कारण खेत में पैरों के निशान छूट गए।
जब घाटम जी संतों को भोजन परोस रहे थे, उनके मन में चिंता थी कि अगली सुबह किसान उन पैरों के निशानों से पहचान लेंगे कि गेहूँ किसने चुराया है। लेकिन जैसे-जैसे संत प्रसाद ग्रहण कर रहे थे, अचानक मौसम बदल गया। तेज़ आंधी चली और बारिश शुरू हो गई, जिससे उनके पैरों के सभी निशान मिट गए। यह चमत्कार देखकर घाटम जी को विश्वास हो गया कि ठाकुर जी उनकी रक्षा कर रहे हैं।

काले घोड़े की चोरी: घाटम जी की आखिरी चोरी
समय बीतता गया। एक बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर घाटम जी ने सोचा, “गुरु की सेवा के लिए मुझे कुछ बड़ा करना चाहिए। एक आखिरी बार बड़ी चोरी करके जो धन मिलेगा, उसे गुरु दक्षिणा के रूप में अर्पित करूंगा।” उन्होंने आमेर के राजा के घोड़े की चोरी की योजना बनाई।
राजा के पास एक दुर्लभ काला घोड़ा था, जिसकी कीमत बहुत अधिक थी। घाटम जी राजमहल पहुंचे। उन्होंने एक सैनिक की वेशभूषा धारण की और राजा के अस्तबल में घुस गए, जहाँ बेशकीमती घोड़े बंधे थे।
रात के समय, पहरेदार ने आवाज लगाई, “कौन है?” गुरु की आज्ञा के अनुसार सदा सत्य बोलने की बात याद करते हुए घाटम जी ने जवाब दिया, “मैं चोर हूँ।” पहरेदार को यह सुनकर अचंभा हुआ, क्योंकि उसे लगा कि कोई चोर खुद को चोर क्यों बताएगा। उसने सोचा कि यह शायद राजा का कोई ख़ास आदमी होगा जो मज़ाक में यह कह रहा है। इसीलिए उसने उन्हें आगे जाने दिया, बिना कोई शंका किए।
घाटम जी ने काला घोड़ा चुराया और लेकर निकल पड़े। उनके सैनिक के भेष में होने के कारण, बाकी पहरेदारों ने भी उन्हें नहीं रोका। घाटम जी ने सोचा कि इस घोड़े को बेचकर गुरुदेव की सेवा के लिए कुछ धन जुटा लेंगे।

ठाकुर जी का चमत्कार: घोड़े का रंग परिवर्तन
रास्ते में सुबह का समय हो गया, और ठाकुर जी की मंगला आरती हो रही थी। उन्हें गुरुदेव की आज्ञा याद आई कि जब भी कोई मठ, मंदिर या आश्रम दिखे, तो तुरंत रुककर प्रणाम करना चाहिए। घाटम जी ने घोड़े को रोका, उसे पेड़ से बांध दिया और मंदिर में जाकर आरती और परिक्रमा करने लगे।
इस बीच, पहरेदारों को यह ख्याल आया कि यदि यह वास्तव में राजा का आदमी होता, तो सबको उसकी जानकारी होती। उन्हें महसूस हुआ कि घाटम जी सचमुच चोर ही थे। राजा के सैनिकों ने उनका पीछा किया और वहाँ पहुँच गए, जहाँ घाटम जी ने घोड़ा बांधा हुआ था। लेकिन जब सिपाही वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि घोड़ा वहीं था, पर उसका रंग पूरी तरह बदल चुका था।
तभी घाटम जी आरती के दर्शन करके बाहर आए। सिपाहियों ने उनसे पूछा, “क्या यह वही घोड़ा है जो तुमने रात में चुराया था?” गुरु की आज्ञा के अनुसार सत्य बोलने के लिए घाटम जी ने कहा, “हाँ, मैं वही चोर हूँ।” सिपाहियों ने फिर पूछा, “लेकिन घोड़ा तो काला था, ये सफेद कैसे हो गया?”
घाटम जी मुस्कुराते हुए बोले, “मुझे नहीं पता। जब मैंने इसे बांधा था, तब यह काला था। लेकिन मुझे लगता है कि मैंने इसे ठाकुर जी को समर्पित किया, और शायद उन्हें काला रंग पसंद नहीं आया, इसलिए उन्होंने इसे श्वेत कर दिया।”

गुरु कृपा: कैसे घाटम जी बने चोर से सच्चे भक्त
सिपाही यह सुनकर अचंभित हो गए और घाटम जी को घोड़े सहित राजा के पास ले गए। राजा ने घोड़े को देखकर कहा, “यह तो मेरा ही घोड़ा है, पर इसका रंग श्वेत कैसे हो गया?” घाटम जी ने फिर सच-सच सबकुछ बता दिया। राजा को यकीन नहीं हुआ, लेकिन जब उन्होंने घोड़े के गाल के पास मस्सा देखा, जो पहले भी था, तो वे आश्चर्यचकित रह गए।
राजा ने कहा, “तुम चोर हो, लेकिन सच बोलते हो और संत की आज्ञा का पालन करते हो, यही कारण है कि घोड़े का रंग बदल गया।” राजा ने आगे कहा, “जो प्रभु अपने भक्त के लिए यह कर सकते हैं, उनकी कृपा हम पर भी अवश्य होगी। इसलिए तुम्हारा सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।” इसके बाद राजा ने घाटम जी को बहुत सारी संपत्ति भेंट की।
घाटम जी, संपत्ति लेकर सीधे अपने गुरु के पास पहुंचे। उनके मन में श्रद्धा और बढ़ गई थी—वे सोच रहे थे कि एक चोर होने के बावजूद, जहाँ उन्हें सजा मिलनी चाहिए थी, वहां उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा मिली। गुरु चरणों में पहुंचकर उन्होंने सब कुछ अर्पित किया और उत्सव में सम्मिलित हुए।
उन्होंने अपने गुरु से कहा, “गुरुजी, जब आपने पहली बार मुझे चोरी से मना किया था, तब मैं समझ नहीं पाया था। लेकिन आज से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब कभी भी चोरी नहीं करूंगा। आपकी कृपा से मुझे यह एहसास हुआ है कि मैं गलत रास्ते पर था।” इस संकल्प के साथ घाटम जी ने चोरी का रास्ता हमेशा के लिए छोड़ दिया।

घाटम जी का ठाकुर जी से साक्षात्कार
समय बीतता गया, और घाटम जी अब सत्संग और साधु सेवा में ही अपने दिन बिताने लगे। लेकिन उनके मन में एक जिज्ञासा थी—वे ठाकुर जी के दर्शन करना चाहते थे। कई दिन तक उन्होंने ठाकुर जी के दर्शन नहीं किए, तो धीरे-धीरे उनके मन में नाराजगी होने लगी। उन्होंने ठाकुर जी से नाराज होकर कहा, “पहले मैं बिना नहाए खाता था, अब आपके लिए नहाकर खाता हूँ और आपको अर्पित करके खाता हूँ। पहले कभी कंठी माला या तिलक नहीं लगाता था, लेकिन अब यह सब भी आपके लिए करता हूँ। प्रभु, मैं आपके लिए इतना सब कुछ कर रहा हूँ, और आप मेरे लिए क्या कर रहे हैं? क्या आप मुझे दर्शन देंगे?”
यह सुनते ही ठाकुर जी तत्काल प्रकट हो गए। घाटम जी ने जब ठाकुर जी के दर्शन किए, तो उनका मन शांत हो गया और उन्होंने महसूस किया कि सच्ची भक्ति और गुरु की आज्ञा का पालन ही सबसे बड़ा धन है।


