इंदिरा एकादशी व्रत कथा: पापों का अंत और पितरों को मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण व्रत

इंदिरा एकादशी व्रत कथा: पापों का अंत और पितरों को मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण व्रत

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यधिक महत्व है। प्रत्येक वर्ष कुल चौबीस एकादशियां आती हैं। लेकिन जब अतिरिक्त माह, जिसे अधिक मास या मल्ल मास कहा जाता है, आता है, तो यह संख्या छब्बीस हो जाती है। अश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है, और इसका महत्व विशेष रूप से बढ़ जाता है क्योंकि यह पितृ पक्ष में आती है। इस एकादशी में पापों का नाश करने और पितरों को निम्न लोकों से मुक्ति देने की शक्ति है। आइए पवित्र इंदिरा एकादशी (पितृपक्ष एकादशी) की कथा और इसके लाभों के बारे में जानें।

धर्मराज युधिष्ठिर भगवान कृष्ण से प्रश्न पूछते हुए और भगवान कृष्ण उत्तर देते हुए।

धर्मराज युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के संवाद में इंदिरा एकादशी का महत्व

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया, “हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का नाम क्या है, और इसका व्रत कैसे किया जाता है? इसके क्या लाभ हैं, कृपया मुझे विस्तार से बताएं।”

भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “हे राजन! इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को समाप्त करने और पितरों को अधोगति से मुक्ति दिलाने वाली है। सुनो, राजन, इसकी कथा को ध्यानपूर्वक सुनो। इस कथा को सुनने मात्र से भी वायपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।”

सत्ययुग में, महिष्मती नामक समृद्ध नगर में धर्मपरायण और प्रभावशाली राजा इंद्रसेन अपने राज्य पर शासन करते हुए।

प्राचीनकाल में सतयुग के में, महिष्मति नामक एक समृद्ध नगरी में इंद्रसेन नामक एक धर्मशील और प्रभावशाली राजा अपने राज्य का संचालन कर रहा था। राजा इंद्रसेन हर प्रकार से सम्पन्न था, पुत्र-पौत्र और धन-धान्य से परिपूर्ण था, और विष्णु के प्रति अटूट भक्ति रखता था।

एक दिन, जब राजा इंद्रसेन अपने दरबार में सुखपूर्वक बैठे थे, अचानक महर्षि नारद आकाश से प्रकट हुए और उनके दरबार में आए। राजा ने उन्हें देखकर शीघ्र सम्मानपूर्वक अपने हाथ जोड़े और उन्हें सीट व अर्घ्य दिया।

एक दिन, जब राजा इंद्रसेन अपनी सभा में प्रसन्नचित्त होकर बैठा था, अचानक आकाश मार्ग से महर्षि नारद प्रकट हुए और उनकी सभा में पधारे। राजा उन्हें देखकर तुरंत सम्मानपूर्वक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक उन्हें आसन और अर्घ्य अर्पित किया।

देवर्षि नारद राजा के सामने आराम से बैठे और पूछते हैं, "हे राजा! क्या आपके सभी अंग कुशल और स्वस्थ हैं?"

देवर्षि नारद ने राजा के सामने आराम से बैठते हुए प्रश्न किया, “हे राजन! क्या आपके सभी अंग कुशल और स्वस्थ हैं? आपकी बुद्धि धर्म की ओर स्थिर है और आपका मन विष्णु भक्ति में पूरी तरह समर्पित है?” देवर्षि नारद की बातें सुनकर राजा ने कहा, “हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुछ अच्छे से चल रहा है और यज्ञ जैसे पुण्य कर्म पूर्ण श्रद्धा के साथ सम्पन्न हो रहे हैं। कृपया बताएं, आपके आगमन का कारण क्या है?” ऋषि ने कहा, “हे राजन! आप मेरे आश्चर्यजनक वचनों को सुनिए।”

फिर देवर्षि नारद ने राजा से कहा, “एक बार मैंने ब्रह्मलोक से यमलोक की यात्रा की और वहाँ यमराज की श्रद्धा पूर्वक पूजा की। मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की भी प्रशंसा की। यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को देखा, जो एकादशी का व्रत न करने के कारण वहाँ थे। उन्होंने संदेश भेजा है कि यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे लिए करोगे, तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति संभव हो सकती है।”

एक बार देवर्षि नारद ब्रह्मलोक से यमलोक गया और वहां यमराज के दरबार में धर्मराज युधिष्ठिर के पिता को देखा, जो वहां इसलिए थे क्योंकि उन्होंने एकादशी व्रत नहीं रखा।

यह सुनकर राजा ने पूछा, “हे महर्षि, कृपया इस व्रत की विधि मुझे बताएं।” नारदजी ने कहा, ” “आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को प्रात: काल स्नान और अन्य पवित्र क्रियाओं के बाद, फिर दोपहर में नदी या किसी पवित्र जलाशय में जाकर स्नान करें। इसके बाद, पितरों को श्रद्धापूर्वक श्राद्ध अर्पित करें और एक बार भोजन करें। एकादशी के दिन प्रात: काल दातून करके स्नान करें और व्रत के नियमों को पूरी श्रद्धा से स्वीकार करें। प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज सभी भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूंगा।'”

हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण में हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें। इस प्रकार, विधिपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के सामने श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार और दक्षिणा दें। बची हुई श्राद्ध सामग्री को गौ को अर्पित करें और ऋषिकेश भगवान की पूजा धूप, दीप, गंध, पुष्प और नैवेद्य से करें।

रातभर भगवान के समीप जागरण करें। फिर द्वादशी के दिन प्रात:काल भगवान की पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। अपने परिवार, स्त्री और पुत्र के साथ आप भी मौन रहकर भोजन करें। नारदजी ने कहा, “हे राजन! यदि तुम इस विधि से और पूर्ण समर्पण के साथ इस एकादशी का व्रत करोगे, तो तुम्हारे पिता निश्चित रूप से स्वर्गलोक को जाएंगे।” इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।

राजा ने नारदजी के कथन के अनुसार अपने परिवार और सेवकों के साथ व्रत किया, जिसके परिणामस्वरूप आकाश से फूलों की वर्षा हुई। उनके पिता गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक की ओर प्रस्थान कर गए। एकादशी के पुण्य से राजा इंद्रसेन ने निष्कंटक राज्य किया और अंत में अपने पुत्र को सिंहासन सौंपकर स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

भगवान श्रीकृष्ण ने कथा समाप्त करते हुए युधिष्ठिर से कहाँ, “हे युधिष्ठिर! यही इंदिरा एकादशी व्रत का महिमा है। इस व्रत के पाठ और श्रवण से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और सभी भोगों का अनुभव करके बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।”