
पंढरपुर की विट्ठल भक्ति परंपरा में जब भी संतों की बात होती है, तो संत गोरा कुम्हार का नाम बड़े अपनत्व के साथ लिया जाता है। वे कोई राजमहल में जन्मे संत नहीं थे, न ही उन्होंने संसार को त्याग कर वन का मार्ग चुना था। वे तो मिट्टी से घड़े बनाने वाले एक साधारण कुम्हार थे—लेकिन उसी मिट्टी में उन्होंने भक्ति का ऐसा स्वरूप गढ़ा, जो आज भी हृदय को स्पर्श करता है।
संत गोरा कुम्हार कौन थे और उन्हें गोरोबा काका क्यों कहा जाता था?
संत गोरा कुम्हार महाराष्ट्र की वारकरी परंपरा के एक महान और सिद्ध संत थे।वे संतश्रेष्ठ शिरोमणि ज्ञानदेव जी के समकालीन थे और पंढरपुर के आराध्य देव श्री विट्ठलनाथ के परम भक्त माने जाते हैं। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उन्होंने ऐसा वैराग्य और तन्मय भक्ति जीवन जिया कि संत नामदेव जी ने उन्हें प्रेमपूर्वक “वैराग्य का मेरु” कहा।
संत मंडली में वे आयु और अनुभूति दोनों में ज्येष्ठ थे। उनके स्वभाव में गहरी करुणा, सरलता और आत्मीयता थी। इसी कारण ज्ञानदेव, नामदेव, सावता माली जैसे संत उन्हें आदर और स्नेह से “गोरोबा काका” या “गोरई काका” कहकर पुकारते थे।
विट्ठल भक्त गोरा कुम्हार का जन्म और प्रारंभिक जीवन
महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में स्थित धाराशिव क्षेत्र का एक छोटा-सा गाँव है—तेरेढोकी। इस गाँव को प्राचीन काल में त्रयीदशा कहा जाता था। इसी पवित्र भूमि पर उस संत का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर भक्ति, वैराग्य और कर्मयोग का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया—संत गोरा कुम्भार।
संतजन सामान्यतः उनका जीवनकाल ईसा सन् 1267 से 1317 के बीच मानते हैं। तेरेढोकी, श्रीक्षेत्र पंढरपुर से लगभग 30 कोस की दूरी पर स्थित था। इस निकटता के कारण गोरा जी का पंढरपुर धाम में बार-बार आना-जाना होता रहता था। वे निष्ठावान वारकरी संत थे।
गोरा जी का जन्म किसी राजवंश में नहीं, बल्कि एक साधारण कुम्हार परिवार में हुआ। उनके माता-पिता—श्री माधव जी और श्रीमती रुक्मिणी बाई—सरल, सहनशील और भक्ति में डूबे हुए थे। वे भगवान श्री कालेश्वर (शिव) के निष्ठावान उपासक थे, परंतु पांडुरंग विट्ठल में भी उतनी ही गहरी श्रद्धा रखते थे। उनके घर में हरी और हर का कोई भेद नहीं था। दोनों नामों का स्मरण, दोनों का भजन और दोनों में एकत्व का भाव—यही वातावरण गोरा जी को बचपन से ही मिला।
पर यह दंपति भीतर से गहरे दुःख को भी ढो रहा था। माधव जी और रुक्मिणी बाई को आठ संताने हुईं, पर दुर्भाग्यवश सभी काल का ग्रास बन गईं। यह पीड़ा उनके हृदय को तोड़ देने वाली थी, फिर भी उनके जीवन से भजन कभी अलग नहीं हुआ।
वे कहते थे—“हमारे प्रभु तो काल के भी काल हैं, फिर भी काल ने हमारे बच्चों को छीन लिया। काश, अंतिम एक संतान भी बच जाती।” उन्हें यह दुःख भीतर से कचोटता था कि आगे भगवान, पितरों और संतों की सेवा करने वाला उनके वंश में कोई शेष नहीं रहा।
ऐसे ही करुण क्षणों में एक दिन स्वयं भगवान उनके घर पधारे। उन्होंने दोनों पति-पत्नी को श्मशान भूमि की ओर चलने को कहा। उस स्थान को ‘गोरी’ कहा जाता था, जहाँ मृत बच्चों को भूमि में गाड़ दिया जाता था। वहीं भगवान ने मिट्टी में दबी उस अंतिम संतान को अपने करकमलों से बाहर निकाला और उसमें पुनः प्राण फूँक दिए। बालक जीवित हो उठा। भगवान उस बालक को माता-पिता की गोद में सौंपकर अंतर्धान हो गए।
‘गोरी’ से जीवन पाने के कारण उस बालक का नाम पड़ा—गोरा या गोराई। बड़े होते-होते उनका जीवन संत्संग और हरिनाम से भर गया। वे नित्य प्रति संत्संग करते और मटके बनाते समय भी निरंतर हरिनाम स्मरण में लीन रहते।
आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी के अवसर पर गोराई काका सहकुटुंब पंढरपुर जाकर भगवान विट्ठल और संतों के दर्शन करते। इसके अतिरिक्त भी जब समय मिलता, वे पंढरपुर अवश्य जाते। वहाँ उन्हें संत नामदेव, कान्होबा पाठक, सावता माली और विसोबा खेचर जैसे महान संतों का सत्संग प्राप्त होता।
धीरे-धीरे गोरा कुम्हार की भक्ति और गहरी होती चली गई। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी वे परम विरक्त की भाँति रहते थे। मिट्टी के ढेर में पानी मिलाकर उसे पैरों से कुचलना उनका दैनिक कार्य था। जब मिट्टी चिकनी हो जाती, तब उससे घड़े का आकार बनता और आग में पकाया जाता।
लेकिन गोरा कुम्हार के लिए यह केवल काम नहीं था—यह साधना थी। जब वे मिट्टी को पैरों से कुचलते, तब हरिनाम स्मरण में इतने डूब जाते कि अपनी सुध-बुध भूल बैठते। कभी-कभी वे उसी अवस्था में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगते—पैर मिट्टी पर चलते रहते और मन पांडुरंग के चरणों में लीन रहता।

संत गोरा कुम्हार की कृपा से नामदेव को सद्गुरु की प्राप्ति
संत श्री गोरा कुम्भार ही वह अद्भुत साधक थे, जिनकी दृष्टि और अनुभव ने नामदेव के अहंकार को दूर कर उन्हें सच्चे सद्गुरु के दर्शन कराए। उस समय नामदेव की कीर्ति पूरे देश में फैल रही थी, हर जगह उनका नाम प्रसिद्ध हो रहा था। लोग उनके हाथ से ग्रहण किए गए भोजन को पांडुरंग का आशीर्वाद मानते थे।
कार्तिकी एकादशी के अवसर पर पंढरपूर क्षेत्र में बड़ी संख्या में भक्त भगवान् से मिलने आते थे। उस दिन संत श्री ज्ञानेश्वर, उनके ज्येष्ठ बंधु और सद्गुरु निवृत्तिनाथ, सोपन और बहन मुक्ताबाई – ये सभी कार्तिकी एकादशी के दिन पंढरपूर पधारे। ज्ञानेश्वर जी उम्र में छोटे थे, परन्तु कर्तुत्व और योग में महान थे। उस समय उनके भाई बहनों के संतत्व की चर्चा पूरे क्षेत्र में थी।
नामदेव बहुत दिनों से इन संतों के दर्शन का इंतजार कर रहे थे। चंद्रभागा नदी के तट पर दूर से ही उन्होंने सभी को देखा और हर्षित हुए। भगवान् के दर्शन के बाद वे सभी संत श्री गोराई काका के घर पधारे।
गोराई काका के घर सभी का स्वागत बड़े प्रेम और सम्मान के साथ हुआ। नामदेव जी पांडुरंग जैसी मुद्रा में खड़े थे, कमर पर हाथ रखे हुए। निवृत्तिनाथ जी बोले – “आज नामदेव यहां पांडुरंग स्वरुप में प्रकट हुए हैं, यह हमारे लिए सौभाग्य है कि हमें उनके दर्शन प्राप्त हुए।”
सभी ने नामदेव जी को साष्टांग दंडवत् प्रणाम किया। ज्ञानेश्वर जी और सोपन जी ने भी श्रद्धा से प्रणाम किया। वारकरी परंपरा के अनुसार, अवस्था चाहे छोटी हो या बड़ी, सभी संतों का सम्मान करना आवश्यक है।
नामदेव जी पांडुरंग भगवान् जैसी मुद्रा में खड़े होकर अभयकर दृष्टि से आशीर्वाद देने लगे। मन ही मन नामदेव सोच रहे थे – “पांडुरंग मेरा सखा है, मैं नित्य उनके सान्निध्य में रहता हूँ। मैं जो भी प्रणाम करता हूँ, वह केवल उनके लिए है, और किसी अन्य को प्रतिनमस्कार की आवश्यकता नहीं।”
मुक्ताबाई ने अभी प्रणाम नहीं किया था। निवृत्तिनाथ जी ने मुक्ताबाई से कहा – “आओ मुक्ता! यह महाभागवत पांडुरंग यहाँ आए हैं, दर्शन करो।”
मुक्ताबाई ने कहा – “मैं क्षमा चाहती हूँ, परंतु मुझे तो केवल पांडुरंग ही दिखाई देते हैं। मैं भक्तों में भगवान् को नहीं देख पा रही हूँ। उनकी अधिक प्रियता ने नामदेव में अहंकार उत्पन्न किया है।”
निवृत्तिनाथ जी ने समझाया – “जब तक अहंकार नहीं मिटता, तब तक प्रणाम का अर्थ नहीं है। भगवान् ने तुम्हारे हाथ से भोजन ग्रहण किया, परन्तु भीतर का अहंकार अभी गया नहीं।”
मुक्ताबाई की दृष्टि पास पड़े कुम्हार की थापी और मटकों पर पड़ी। उन्होंने पूछा – “काका! क्या आप इस थापी से मटका कच्चा है या पक्का, इसका निर्णय करते हैं?”
गोराई काका मुस्कुराए और बोले – “हाँ बेटी, यही प्रयोग मनुष्य की कच्चाई और पक्काई को देखने के लिए होता है।”
मुक्ताबाई ने गहराई से देखा और कहा – “हम मनुष्य भी तो मिट्टी के घड़े ही हैं। कृपया इस थापी से हमारी कच्चाई और पक्काई का अनुभव कराएं।”
गोराई काका ने थापी उठाई और सभी के सिर पर ध्यानपूर्वक रखा। भक्तजन कौतूहल और श्रद्धा से देखते रहे। जैसे ही नामदेव के सिर पर थापी लगी, वहाँ से ‘कच्चे मटके जैसी’ आवाज आई। गोराई काका बोले – “देखो नामा, यह घड़ा अभी पक्का नहीं हुआ। इसे पक्का करना बाकी है।”
नामदेव क्रोध और संकोच में बोले – “गोराई काका! यह क्या रीति है, कोई आदर-सत्कार की परंपरा भी है क्या?”
गोराई काका ने गंभीरता से उत्तर दिया – “नामा, तुम्हारा ज्ञान अभी परिपूर्ण नहीं है। भक्ति में अहंकार बाधक है। समर्थ सद्गुरु के सामने नतमस्तक होकर अपने अहंकार को त्यागना होगा।”
इस अनुभव के बाद नामदेव सीधे पंढरपूर गए और भगवान् के चरणों में जाकर कहने लगे – “प्रभो! सभी संतों ने मेरा घड़ा कच्चा बताया। मेरी हँसी उड़ गई। अब मैं क्या करूँ?”
भगवान् हंसते हुए बोले – “नामा! तुम्हारा भक्तिभाव निर्मल है, दातृत्व विशाल है, परंतु अहंकार भक्ति में बाधक है। मैं केवल मूर्ति में नहीं, अपितु सभी प्राणियों, संतो और कण-कण में व्याप्त हूँ। जब तुम सर्वत्र मेरा दर्शन करोगे, तब छोटे-बड़े का भेद मिट जाएगा। समर्थ महापुरुष की शरण ग्रहण करना आवश्यक है।”
भगवान् की आज्ञा से नामदेव औंढ्या नागनाथ तीर्थक्षेत्र गए और वहाँ विशोबा खेचर नामक सिद्ध महात्मा की शरण ली। वहाँ उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा – एक वृद्ध, पागल सा प्रतीत होने वाला व्यक्ति शिवलिंग पर पैर रखकर विश्राम कर रहा था।
नामदेव हैरानी से बोले – “ओ बाबाजी! आपको पता है आप किसपर पैर रखकर सो रहे हैं?”
वृद्ध व्यक्ति ने सरलता से कहा – “बेटा, आयु अधिक है, बल नहीं है। दृष्टि कमजोर है, मुझे कुछ पता नहीं।”
नामदेव ने फिर कहा – “आप शिवलिंग पर पैर रखकर लेटे हैं।”
वृद्ध ने सहजता से उत्तर दिया – “अच्छा, जहाँ भगवान् नहीं, वही मेरा पैर कर दो।”
लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, उनके पैर के नीचे फिर शिवलिंग प्रकट हो गया। नामदेव ने वृद्ध को उठाकर अलग जगह पर रखा, पर वहाँ भी शिवलिंग प्रकट हुआ। यह देख नामदेव चकित रह गए।
वृद्ध ने उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा – “अरे नामा! जहाँ भगवान् नहीं, वहाँ तुम्हें कैसे मिलेगा? मैं स्वयं विश्वव्यापी हूँ। तुम्हें समझना होगा कि जो तुम्हें भीतर दिखाई नहीं देता, वही तुम्हारा परम सखा है। संत केवल बाहरी रूप से ही नहीं, भीतर से भी मार्ग दिखाते हैं। बहार से कई लोग मदद कर सकते हैं, परन्तु भीतर से आधार देने वाला केवल संत है।”
नामदेव ने साष्टांग दंडवत् किया और अपने अहंकार को त्यागकर समर्पित कर दिया। उन्होंने जाना कि संत गोरा कुम्भार की लीला उनके कल्याण के लिए थी।
जैसे मटका तैयार करने के लिए कुम्हार के हाथ केवल बाहरी रूप से ही नहीं, बल्कि भीतर से भी लगते हैं, वैसे ही संत भी शरणागत की आत्मा को भीतर से पक्का करते हैं। बहार से मदद मिलती है, परन्तु भीतर का आधार केवल संत ही प्रदान कर सकते हैं।
और उसी समय, संत गोरा कुम्हार अपने घर में कच्ची मिट्टी के ढेर को पानी मिलाकर पैरों से कुचल रहे थे, हरिनाम के संकीर्तन में तन्मय और मग्न, जैसे भीतर से ही सम्पूर्ण संसार को संवार रहे हों।

गोरा जी के बालक का मिट्टी में दबकर मरना और पत्नी का भगवान की कसम देना
संत गोरा कुम्भार का जीवन मिट्टी, भक्ति और हरिनाम में व्यतीत होता था। एक दिन वे घर के आँगन में कच्ची मिट्टी के ढेर को पानी मिलाकर घड़े बनाने की तैयारी कर रहे थे। पैरों से मिट्टी को कुचलते हुए उनका मन विट्ठल के सुंदर रूप में लीन था, और मुँह से “हरिनाम, हरिनाम” की अनवरत ध्वनि निकल रही थी। मिट्टी पर पैरों की गति और हृदय में भगवान के नाम का जप—सभी कुछ एक साथ उनके जीवन का भाग बन गया था।
उसी समय उनकी पत्नी रामी घर के काम से बाहर जाने लगी। वह कहती है—
“मैं बच्चे को यहाँ छोड़कर नदी जाकर पानी भरकर आऊँगी, ध्यान रखना।”
बालक खेलते-खेलते पिता के चरणों की ओर बढ़ा, शायद प्यार में उनके पास जाने के लिए। लेकिन गोरा जी का मन भगवान के नाम में इतना डूबा हुआ था कि उन्हें यह पता ही नहीं चला। बालक मिट्टी के ढेर में दब गया। कुछ ही क्षणों में बालक का जीवन समाप्त हो गया।
रामी जब वापस आई, तो उसकी आँखों के सामने मिट्टी लाल और रक्त से रंजित थी। बालक नहीं दिखा। सिर पर उठाए पानी के मटके को फेंकते हुए वह दौड़कर गोरा जी को जोर-जोर से हिलाने लगी।
“बचाओ! हमारा बच्चा… मिट्टी में दबकर मर गया!”
गोरा जी भाव-स्थिति से बाहर आए, हृदय में गहरा पश्चाताप हुआ। लेकिन वे भीतर से उच्च कोटि के वैरागी थे। उन्होंने सोचा—अब जो हो गया, उसके लिए शोक करने का कोई अर्थ नहीं। मन फिर से हरिनाम में लीन हो गया।
रामी क्रोध और दुःख में बोली—
“इस भजन और भक्ति के कारण हमारा बच्चा मर गया! आग लगे ऐसे भजन को!”
गोरा जी को यह अपशब्द सुनकर भीतर से बहुत व्यथा हुई। वे पत्नी के पास दौड़े, गुस्से में हाथ बढ़ाया।
“खबरदार! मेरे शरीर का स्पर्श नहीं करना, तुम्हें तुम्हारे विट्ठल की कसम है!”
भगवान का नाम सुनते ही गोरा जी पीछे हट गए और शांत हो गए।
कुछ दिनों तक घर में नाराजगी और दूरी बनी रही। रामी ने सोचा—जो हो गया सो हुआ, जानबूझकर तो कुछ नहीं किया। वह गोरा जी के पास गई और क्षमा माँगी, कहकर—
“भगवान की शपथ लेकर मुझसे भूल हो गई।”
गोरा जी ने उत्तर दिया—
“अब हमने निश्चय कर लिया, सो कर लिया। मैं अब तुम्हारे शरीर का स्पर्श नहीं करूँगा।”
कुछ समय बाद रामी अपने माता-पिता के घर चली गई। उन्होंने सब विस्तार से बताया कि अब वंश खतरे में है। यदि परिवार का वंश आगे बढ़ाना है, तो उनकी छोटी बहन को गोरा जी के साथ विवाह करा देना चाहिए। पहले गोरा जी ने मना किया, पर जब उनके ससुरजी ने आग्रह किया, तो उन्होंने हाँ कर दी।
विवाह के दिन ससुरजी ने गोरा जी से कहा—
“दोनों बहनों के साथ समान व्यवहार रखना, कोई भेदभाव न करना।”
गोरा जी ने सोचा—“बड़ी बहन का स्पर्श नहीं कर सकते, और अब ससुरजी कह रहे हैं दोनों के साथ समान व्यवहार।” बस, उन्होंने निश्चय कर लिया कि नवविवाहिता पत्नी का भी वे स्पर्श नहीं करेंगे। दोनों बहनों को यह समझाना कठिन था। छोटी बहन रोने लगी, बड़ी बहन ने समझा कर शांत किया।
गोरा जी द्वारा अपने हाथ कटवा लेना और भगवान का उनके घर नौकरी करना
रात्रि में दोनों पत्नियां गोरा जी के दोनों ओर सो गईं। नींद में उन्होंने गोरा जी के हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख दिए। गोरा जी जब जागे और अपने हाथ देखे, तो सोचा—“ये हाथ बहुत पापी हैं, प्राणसखा विट्ठल की शपथ को भूल गए हैं। इन पापी हाथों को दंड मिलना चाहिए।”
पास ही खेत में कुछ धारदार, नुकीले पत्थर पड़े थे, जो फर्श बनाने के काम आते थे। संत गोरा कुम्हार वहाँ गए और वही पत्थरों पर अपने दोनों हाथ रगड़कर कटवा दिए।
हाथ कटने के कारण उनका व्यापार बंद हो गया। उनका शरीर कमजोर और थका हुआ था, पर मन हर समय भगवान के नाम में स्थिर रहता। घर में उनका कुत्ता भी उनका सान्निध्य छोड़कर कहीं नहीं जाता था। गोरा जी और उनकी पत्नी रामी दोनों उपवास और भक्ति में लीन थे। प्रातःकाल उठते ही वे हरिनाम जपते और रूपध्यान करते। किसी से सहायता मांगना न चाहते थे, और न ही अपनी पत्नी को भेजते। धीरे-धीरे उनकी देह निस्तेज होने लगी।
भगवान श्रीकृष्ण ने यह सब देखा। उन्होंने सोचा—इतने भक्त की विपन्न अवस्था सहन नहीं की जा सकती। लेकिन गोरा जी की शपथ और उनकी भक्ति की परीक्षा थी। रुक्मिणी माता ने भगवान से हठ करके पूछा, और भगवान ने सब विस्तार से बताया—गोरा जी की यह स्थिति उनके नाम की शपथ के कारण हुई है।
फिर भगवान ने अपने प्रिय रूप में गोरा जी के घर एक अद्भुत लीला दिखायी। उन्होंने स्वयं कुम्हार का रूप धारण किया, रुक्मिणी माता ने कुम्हारनी का रूप, और गरुड़ जी ने गधे का रूप ले लिया। तीनों गोरा जी के घर पहुँचे। भगवान कुम्हार ने विनम्रतापूर्वक कहा—
“हम पंढरपूर से आए हैं और काम ढूँढ रहे हैं। यदि आपके यहाँ कोई कुम्हारी का काम है तो हम उसे करने के लिए तैयार हैं।”
गोरा जी ने कहा—”काम तो है, पर पैसे नहीं हैं। मैं आपको पगार नहीं दे सकता।”
भगवान ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया—”कोई बात नहीं। आप हमें कीर्तन सुनाइए और दो समय का भोजन दे दीजिए।”
गोरा जी ने उन्हें अपने घर में ठहराया। विठु कुम्हार ने न केवल सभी कार्यों को पूरी निष्ठा और लगन से किया, बल्कि हर कार्य में उत्कृष्टता दिखाई। सुबह गधे के ओवर में मिट्टी लाना, बर्तन बनाना और सुंदर नक्षी बनाना—सब कुछ उन्होंने अपनी श्रम शक्ति और समर्पण से किया। रुक्मिणी जी भी उनकी सहायता करतीं, और धीरे-धीरे गोरा जी का व्यवसाय पुनः फलने-फूलने लगा।
गाँव और आस-पास के लोग देख कर चकित थे—गोरा काका के यहाँ कोई विट्ठल कुम्हार आकर बर्तन बनाता है, और कोई पगार नहीं लेता, केवल कीर्तन सुनने और भक्ति के लिए काम करता है।
आषाढ़ी एकादशी के निकट आते ही पंढरपुर के कई संत, जैसे निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, मुक्ताबाई, यात्रा के दौरान गोरा जी के गाँव पहुँचे। उन्हें यह खबर मिली कि गोरा जी के यहाँ भगवान स्वयं कार्य कर रहे हैं। संतजन ने गोरा जी के घर पहुँचकर देखा—वहाँ कीर्तन, भक्ति और सेवा का अद्भुत संगम चल रहा था।
गोरा जी ने जब देखा कि उनके सामने संतजन हैं, तो वे एक बालक की भाँति दौड़े, आँखों में अश्रु और प्रेम भरा हृदय। ज्ञानदेव जी ने देखा और कहा—
“गोराई काका! यह विठु कुम्हार नहीं है, यह तो पंढरिनाथ श्रीकृष्ण हैं। उन्होंने आपके प्रेम और भक्ति के कारण यहाँ कार्य किया। धन्य हैं आप, धन्य हैं आपकी भक्ति।”
संत गोरा कुम्हार के हाथ कैसे लौटे? चमत्कारी कथा
श्री ज्ञानदेव जी ने गोराई काका की पत्नी से कहा कि भगवान् द्वारा बनाए गए बर्तन उन्हें दिखाएँ। जब नामदेव जी ने उन बर्तनों को देखा, तो हर बर्तन से दिव्य तेज और प्रकाश निकल रहा था। जैसे ही उन्होंने एक बर्तन उठाकर पास लाया, उसमें से “विट्ठल, विट्ठल” की अद्भुत ध्वनि निकलने लगी।
यह अद्भुत लीला देखकर आसपास खड़े सभी संत और भक्तजन गोराई काका की जय-जयकार करने लगे। हर कोई उनके चरणों में श्रद्धा और आनंद के भाव से झूम उठा।
आषाढ़ी एकादशी का पावन दिन आया। पंढरपुर की गलियों में भक्तों की चहल-पहल और संतों का आगमन उत्साह और भक्ति का माहौल बना रहा था। गोरा कुम्हार अपने दोनों पत्नियों, संती और रामी के साथ वहाँ पहुँचे। पहले उन्होंने भगवान विट्ठल के दर्शन किए और फिर संत नामदेव जी से भेंट की। नामदेव जी गोरा काका को देखकर भावविभोर हो गए, उनके हृदय में श्रद्धा और विस्मय की मिली-जुली अनुभूति थी।
गोरा काका ने अनुरोध किया—”संतजन, कृपया कीर्तन सुनाइए।” नामदेव जी थोड़े संकोच में थे, क्योंकि गोरा काका की दशा देखकर उनका मन उदास था। लेकिन सभी संतों के आग्रह पर उन्होंने कीर्तन आरंभ किया।
फिर पूरे पंढरपुर में गूँजी “विट्ठल, विट्ठल, पांडुरंग! जय जय रामकृष्ण हरी!”
टाल और मृदंग की थाप, हाथों की तालियाँ—सबने मिलकर वातावरण को भक्ति से भर दिया। गोरा काका आनंद और उल्लास के अतिरेक में झूमने लगे।
और फिर एक अद्भुत दिव्य चमत्कार हुआ—गोरा काका के कटे हुए हाथ धीरे-धीरे पुनः उभरने लगे। जैसे ही उनके हाथ पूर्ण रूप से वापस आए, उन्होंने उन्हें ऊपर उठाया और तालियाँ बजाकर झूमने लगे। संत और भक्तजन इस अद्भुत दृश्य को देखकर अचंभित और प्रसन्न हो उठे। भगवान विट्ठल भी कीर्तन में नृत्य कर रहे थे, और गोरा काका की भक्ति को देख वे अत्यंत प्रसन्न थे।
गोरा काका की दोनों पत्नियाँ, संती और रामी, आनंद और प्रेम के भाव से भर उठीं। उनके मुख से भी “विट्ठल, विट्ठल, पांडुरंग” की आवाजें निकलने लगीं।
कीर्तन समाप्त होने के तुरंत बाद एक और चमत्कार हुआ। रामी ने अनुभव किया कि उनके पैरों के पास कोई “माँ! माँ!” कह रहा है। नीचे देखा—आश्चर्य! यह उनका वही बालक था, जो पहले मिट्टी में दबकर मर गया था। भगवान पांडुरंग की प्रसन्नता के कारण उनके आँखों में अश्रु छलक रहे थे।
भीड़ में खड़ी नामदेव की दासी संत जनाबाई भी इस दिव्य दृश्य को देख आश्चर्यचकित रह गईं। भगवान पांडुरंग गोरा काका के सामने प्रकट हुए और उन्हें आलिंगन दिया। उन्होंने कहा—
“तुमने मेरी शपथ के कारण अपनी दोनों पत्नियों का स्पर्श नहीं किया, पर अब तुम्हें किसी शपथ के बंधन में नहीं होना। अपने परिवार के साथ प्रेम से रहो और भजन में लीन रहो।”
इसके बाद भगवान ने अन्य संतों से भी मिलकर आशीर्वाद दिया और अंतर्धान हो गए।


