
“श्याम चूड़ी बेचने आया” भजन में भगवान श्रीकृष्ण के मनोहर और चंचल रूप का सुंदर वर्णन मिलता है, जहाँ वे राधा और गोपियों से मिलने के लिए एक चूड़ीवाले (मणिहारी) का भेष बनाते हैं। साधारण वेशभूषा में, कृष्ण गाँव की गलियों में पहुँचते हैं और रंग-बिरंगी चूड़ियाँ बेचने लगते हैं।
गोपियाँ उनके वास्तविक स्वरूप से अनजान होकर खुशी-खुशी चूड़ियाँ चुनने लगती हैं, जबकि राधा को इस आकर्षक चूड़ीवाले में अपना प्यारा श्याम दिखाई देता है। यह भजन राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम, भक्ति और दिव्य लीलाओं का प्रतीक है, जहाँ कृष्ण की प्रत्येक लीला आनंद, प्रेम और आध्यात्मिकता से भरी होती है।
श्याम बने मनिहारिन – राधा कृष्ण की प्रेम लीला कथा
ब्रह्मांड के स्वामी श्रीकृष्ण के लिए भी सबसे बड़ा धन उनका प्रेम है—और उस प्रेम की अधिष्ठात्री हैं श्रीराधा रानी। एक समय की बात है—ब्रज की अधिष्ठात्री, प्रेम की साकार मूर्ति श्री राधा रानी किसी कारणवश अपने प्राणप्रिय कन्हैया से रूठ गईं और वृन्दावन नहीं आईं। पर प्रेम जहाँ हो, वहाँ विरह अधिक देर ठहर नहीं सकता। राधा के मान को हरने और उनके प्रेम की गहराई को जानने के लिए श्यामसुंदर ने एक अनुपम लीला रची।
ब्रज में चूड़ियाँ बेचने वाली स्त्रियों को मनिहारिन कहा जाता है। बस फिर क्या था—श्यामसुंदर ने साड़ी ओढ़ी, सिर पर घूँघट डाला और स्वयं को एक सुंदर मनिहारिन के रूप में सजा लिया। नेत्रों में काजल, वेणी में गजरा, हाथों में चूड़ियाँ, भुजाओं में बाजूबंद, उँगलियों में अंगूठियाँ, गले में हार और नाक में नथनी—इस सजीव श्रृंगार में श्यामवर्ण और भी अधिक शोभायमान हो उठा। इस प्रकार नर से नारी बनकर वे बरसाने की गलियों में घूमने लगे।
मधुर स्वर में पुकार लगाने लगे—
“चूड़ियाँ ले लो… सुहाग की चूड़ियाँ…”
राधा रानी के महल में मनिहारिन
समस्त लोकों के स्वामी अपनी प्रिया को मनाने के लिए राधा रानी के महल के नीचे मधुर स्वर में चूड़ियाँ बेचने लगे। उनकी मधुर पुकार सुनकर राधा रानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने ललिता सखी से कहा कि उस मनिहारिन को भीतर बुला लाया जाए।
मनिहारिन के रूप में जब कन्हैया राधा जी के सामने आए, तो श्रीजी मुस्कराकर बोलीं,
“सखी, तुम मुझे अत्यंत प्रिय लग रही हो। तुम्हारी कद-काठी, चाल-ढाल और भाव मेरे कन्हैया से मिलते-जुलते हैं।”
पकड़े जाने के भय से श्यामसुंदर ने तुरंत बात बदलते हुए कहा,
“स्वामिनी, आपको किस रंग की चूड़ियाँ दिखाऊँ? लाल, हरी, पीली, गुलाबी, बैंगनी—मेरे पास सभी रंग हैं।”
राधा रानी ने बिना किसी विचार के उत्तर दिया,
“मैं केवल श्याम रंग की ही चूड़ियाँ पहनूँगी।”
यह सुनकर कन्हैया चकित हो गए और पूछ बैठे,
“इतने सुंदर रंगों के होते हुए भी आपको केवल श्याम रंग ही क्यों प्रिय है?”
राधा जी ने भावपूर्ण स्वर में कहा,
“मेरे प्राणप्रिय कन्हैया का वर्ण श्याम है। उस रंग से अधिक प्रिय रंग मेरे लिए सम्पूर्ण सृष्टि में दूसरा कोई नहीं।”
प्रेम में पकड़ी गई चोरी
इतना सुनते ही श्यामसुंदर आनंद से भर उठे। वे अपने को रोक न सके और नाचने लगे। नृत्य करते-करते उनके सिर से साड़ी का पल्लू खिसक गया और लीला का रहस्य प्रकट हो गया।
अपने प्रिय को सामने देखकर राधा रानी का मान क्षण भर में विलीन हो गया। उन्होंने कन्हैया को हृदय से लगा लिया। इस प्रकार प्रेम, भक्ति और समर्पण का दिव्य मिलन सम्पन्न हुआ। यह अलौकिक दृश्य देखकर सभी सखियाँ भी युगल सरकार को बीच में लेकर आनंद से नृत्य करने लगीं।
इस लीला की स्मृति में रचित भजन “श्याम चूड़ी बेचने आया” केवल एक गीत नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और समर्पण का मधुर संवाद है। आइए, इस भजन के माध्यम से उस अलौकिक क्षण को अनुभव करें, जहाँ भेष उतर जाता है और प्रेम प्रकट हो जाता है…
लिरिक्स – श्याम चूड़ी बेचने आया भजन
मनिहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
झोली कंधे धरी, उस में चूड़ी भरी। (३)
गलियों में शोर मचाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
राधा ने सुनी, ललिता से कही। (३)
मोहन को तरुंत बुलाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
चूड़ी लाल नहीं पहनू, चूड़ी हरी नहीं पहनू। (३)
मुझे श्याम रंग है भाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
राधा पहनन लगी श्याम पहनाने लगे। (३)
राधा ने हाथ बढाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
राधे कहने लगी, तुम हो छलिया बढे। (३)
धीरे से हाथ दबाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
मनिहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥
मनिहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया।
छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥


