सीता नवमी: व्रत की महिमा और उसकी प्रेरणादायक लघु कथा

सीता नवमी: व्रत की महिमा और उसकी प्रेरणादायक लघु कथा

सीता नवमी एक अत्यंत पावन पर्व है, जो माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। माता सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। यह शुभ तिथि हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आती है।

रामायण के अनुसार, मिथिला के राजा सीरध्वज जनक संतान प्राप्ति की इच्छा से एक यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। उसी समय वे स्वयं हल चलाकर भूमि जोत रहे थे। जब हल का अग्र भाग भूमि में अटक गया, तो खुदाई करने पर वहाँ एक दिव्य पात्र प्राप्त हुआ, जिसमें एक कन्या शिशु प्रकट हुई — वही थीं माता सीता।

चूंकि माता सीता का प्राकट्य धरती से हुआ था, इसलिए उन्हें “भूमिपुत्री” कहा जाता है। संस्कृत में हल के अग्र भाग को भी “सीता” कहा जाता है, जिससे उनका नाम पड़ा। राजा जनक और रानी सुनयना ने उन्हें प्रेमपूर्वक अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।

आज भी बिहार के सीतामढ़ी जिले में स्थित पुनौरा धाम को माता सीता का जन्मस्थान माना जाता है। इस पावन स्थल का न केवल ऐतिहासिक बल्कि गहरा आध्यात्मिक महत्व भी है। सीता नवमी के दिन यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु एकत्र होते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर भगवान श्रीराम और माता सीता की पूजा करने से सोलह महादानों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत जीवन में सुख, सौभाग्य, सद्भाव और आत्मसंयम प्रदान करता है।

माता सीता को नारीत्व की सजीव प्रतिमा माना जाता है। वे न केवल भगवान राम की पत्नी हैं, बल्कि आदर्श पत्नी, आदर्श माता और नारी शक्ति की शाश्वत प्रतीक भी हैं। सीता नवमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और करुणा की उस अमर कथा को स्मरण करने का दिन है, जिसे माता सीता ने जिया।

सीता नवमी कब और क्यों मनाई जाती है?

सीता नवमी, जिसे जानकी नवमी या सीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन माता सीता का पृथ्वी पर दिव्य प्राकट्य हुआ था।

राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में एक छोटा सा घर, जहाँ ब्राह्मण देवदत्त अपनी पत्नी शोभना के साथ साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं

सीता नवमी की व्रत कथा

बहुत समय पहले, राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में देवदत्त नाम के एक ब्राह्मण अपने छोटे-से घर में अपनी पत्नी शोभना के साथ रहते थे। देवदत्त एक धार्मिक और विद्वान पुरुष थे — वेदों का गहन ज्ञान रखते थे और साधु-स्वभाव के थे। अपने घर का खर्च चलाने के लिए वे गांव-गांव जाकर भिक्षा मांगते थे।

देवदत्त की अनुपस्थिति में, शोभना कुसंगति में पड़ गई और परपुरुषों के साथ व्यभिचार में लिप्त हो गई। जैसे-जैसे समय बीता, पूरे गांव को उसके दुष्कर्मों की जानकारी हो गई। अपने ही पति के साथ विश्वासघात करने के कारण गांववासियों ने उसकी तीव्र निंदा की। यह सब सुनकर शोभना अत्यंत क्रोधित हो उठी और प्रतिशोध की भावना से उसने पूरे गांव में आग लगा दी। दुर्भाग्यवश, वह स्वयं भी उस आग की चपेट में आ गई और उसकी वहीं मृत्यु हो गई।

अपने पापों के फलस्वरूप, अगले जन्म में शोभना का जन्म एक चांडाल परिवार में हुआ और वह चांडालिनी कहलाने लगी। पिछले जन्म के पापों की सजा स्वरूप उसे घोर गरीबी, कुष्ठ रोग और अंधत्व जैसे कष्ट झेलने पड़े। भोजन की तलाश में वह एक नगर से दूसरे नगर तक भटकती रही।

गरीबी, कुष्ठ रोग और अंधेपन से पीड़ित शोभना कौशलपुरी में भूख से व्याकुल होकर करुण स्वर में भोजन की याचना करती हुई

एक दिन वह भोजन की खोज में कौशलपुरी पहुंची, जहां संयोगवश उस दिन सीता नवमी का पर्व मनाया जा रहा था। नगरवासी व्रत और पूजन में लीन थे। भूख से व्याकुल और पीड़ाओं से जर्जर उस स्त्री ने लोगों से करुण स्वर में भोजन की याचना की।

वह बोली, “हे सज्जनों, मुझ पर दया करो, कुछ भोजन दे दो। मैं भूख से मर रही हूं।” इस पर एक व्यक्ति ने उत्तर दिया, “देवी, आज सीता नवमी है। इस दिन अन्न का दान वर्जित है। कल व्रत का पारण होगा, तब प्रसाद मिलेगा।”

परंतु चांडालिनी तो पीड़ा से बेहाल थी और ज़ोर-ज़ोर से भोजन की गुहार लगाने लगी। अंततः एक श्रद्धालु ने उसे तुलसी पत्र और जल प्रदान किया। वही लेकर वह वहां से आगे बढ़ गई। कुछ ही दूर जाने पर उसकी मृत्यु हो गई, परंतु अज्ञानवश भी वह सीता नवमी का व्रत पूर्ण कर चुकी थी।

इस अनजाने व्रत के प्रभाव से देवी सीता प्रसन्न हुईं और उसे उसके समस्त पापों से मुक्त कर दिया। सीता माता की कृपा से उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई, जहां उसने अनेक वर्षों तक आनंदपूर्वक समय व्यतीत किया।

पुनर्जन्म में वह कामरूप देश के महाराजा जयसिंह की महारानी कामकला के रूप में जन्मी। व्रत की शक्ति से उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रही। इस स्मरण के प्रभाव से महारानी कामकला ने अपने राज्य में अनेक देवालयों का निर्माण कराया, जिनमें जानकी और रघुनाथ की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की गई।

अपने शेष जीवन को उन्होंने प्रभु श्रीराम और माता सीता की सेवा में समर्पित कर दिया और इस प्रकार अपने जीवन को धन्य बनाया।

सीता नवमी व्रत की महिमा

मान्यता है कि सीता नवमी के दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजन करने से व्यक्ति को पृथ्वी दान, सोलह महान दानों और समस्त तीर्थों के दर्शन के बराबर फल प्राप्त होता है। विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख की कामना करती हैं।