भक्त राजा जयमल जी की कथा: जिनकी रक्षा के लिए भगवान ने रणभूमि में स्वयं मोर्चा संभाला

भक्त राजा जयमल जी की कथा: जिनकी रक्षा के लिए भगवान ने रणभूमि में स्वयं मोर्चा संभाला

यह कथा राजस्थान के मेरता राज्य के राजा श्री जयमल जी महाराज की है, जो भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उनकी भक्ति का वर्णन वैष्णव परंपरा के पावन ग्रंथ भक्तमाल में मिलता है। वे रसिक शिरोमणि संत श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के शिष्य थे। यद्यपि वे श्री राधा-माधव जी के अनन्य उपासक थे, लेकिन उनके आराध्य देव धनुषधारी श्रीराम थे। संत सेवा और बड़े पैमाने पर संत-सम्मेलनों के आयोजन के कारण उनकी राजधानी मेरता को “मिनी मथुरा” के नाम से जाना जाने लगा।

जयमल जी और मीराबाई का भाई-बहन का सुंदर दृश्य।

भक्त राजा जयमल जी: मीराँबाई के भाई का चरित्र

मारवाड़ नरेश राव दूदा जी के तीन पुत्र थे – रायमल जी, वीरम जी, और रत्नसिंह जी। रत्नसिंह जी की सुपुत्री थीं भक्त मीराँबाई, और श्री रायमल जी के पुत्र थे भक्त राजा श्री जयमल जी। इस प्रकार, जयमल जी और मीराँबाई भाई-बहन थे।

मेड़ता के नरेश राव जयमल भगवान श्री कृष्ण के अनन्य उपासक थे। उन्हें भक्ति के गहरे संस्कार अपनी बहन मीराँबाई से प्राप्त हुए थे। मीराबाई राव जयमल के चाचा की लड़की थीं, और दोनों भाई-बहन की आयु में अधिक अंतर नहीं था। उस समय राठौड़ों में मेड़ता रियासत सबसे बड़ी मानी जाती थी, और राव जयमल मेड़ता के नरेश थे।

दर्द से पीड़ित संत द्वारा अपने गुरुजी से मिलने के लिए जयमल जी से घोड़े की प्रार्थना करते हुए दृश्य।

संत सेवा में श्री जयमल जी का निस्वार्थ भाव

एक बार, साधु-संतों की एक टोली श्री जयमल जी के यहाँ ठहरी। उसी समय, संतों में से एक, जिनके पैर में अत्यधिक पीड़ा थी और चलने में असमर्थ थे, अपने गुरुदेव के दर्शन की प्रबल इच्छा रखते थे। उनके गुरुदेव पास के एक गाँव में ठहरे हुए थे। संत ने अपनी समस्या श्री जयमल जी को बताई और उनसे एक घोड़े की मांग की ताकि वे सवारी करके अपने गुरुदेव के दर्शन कर सकें।

श्री जयमल जी ने बिना समय गंवाए संत को अपना घोड़ा प्रदान कर दिया। संत अपने गुरुदेव के पास पहुंचे और दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया। गुरुदेव ने जब घोड़े को देखा, तो उसकी सुन्दरता और शक्ति ने उन्हें प्रभावित किया। उनके मन में घोड़े को पाने की इच्छा जाग उठी। यह देखकर उनके शिष्य ने बिना संकोच के घोड़ा गुरुदेव को समर्पित कर दिया।

जब संत वापस लौटे, तो उन्होंने पूरी घटना ईमानदारी से श्री जयमल जी को बता दी। संत की सच्चाई और अपने गुरुदेव के प्रति भक्ति को देखकर जयमल जी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “मेरे पास जो कुछ भी है, वह संतों की सेवा के लिए ही है। यदि और घोड़ों की आवश्यकता हो, तो बेहिचक ले जाइए।”

श्री जयमल जी की इस निःस्वार्थ सेवा भावना को देखकर सभी संत अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्री जयमल जी को आशीर्वाद दिया और उनकी भक्ति व सेवा भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

श्री जयमल सिंह जी का प्रतिदिन चार घंटे तक भजन, ध्यान और सेवा में लीन रहने का दृश्य।

राजा जयमल सिंह जी का ठाकुरजी की सेवा का कठोर नियम

श्री वीरम सिंह जी के सुपुत्र, परम भक्त श्री जयमल सिंह जी का प्रारंभिक निवास मेड़ते नगर में था, किंतु बाद में वे जोधपुर नगर में निवास करने लगे। वे श्री ठाकुर जी की सेवा और आराधना में अत्यधिक अनुरक्त थे, क्योंकि वे श्री हितहरिवंश जी के परम शिष्य थे। उनकी भक्ति और सेवा में ऐसी गहरी तन्मयता थी कि सेवा काल में किसी भी प्रकार की विघ्नबाधा उन्हें सहन नहीं होती थी।

श्री जयमल सिंह जी प्रतिदिन अपने मंदिर में नियमपूर्वक दस घड़ी, अर्थात् चार घंटे, की सेवा करते थे। इन चार घंटों के दौरान वे एक ही आसन पर बैठे भगवान का स्मरण करते, भजन करते और सेवा में पूर्ण रूप से लीन हो जाते। उन्होंने अपने राज्य में स्पष्ट घोषणा की हुई थी कि उनके भजन और पूजा के समय, अर्थात् इन चार घंटों में, यदि कोई व्यक्ति उनकी साधना में विघ्न उत्पन्न करेगा, तो उसे मृत्युदंड दिया जाएगा।

यह नियम इसलिए था ताकि कोई भी उनके भक्ति-समर्पण के क्षणों में बाधा न डाले और उनकी साधना में पूरी तन्मयता बनी रहे। उनके इस नियम की गंभीरता से सभी परिचित थे, और इसी कारण सेवा के समय लोग उनके निकट जाने से भी संकोच करते थे।

जब ठाकुरजी की सेवा के समय मंडोवर के राजा ने किया आक्रमण

श्री जयमल सिंह जी के एक भाई मंडोवर के राजा थे, जो उनसे शत्रुता रखते थे। उन्होंने कई बार जयमल जी पर आक्रमण करने का प्रयास किया, परंतु जयमल जी अद्वितीय योद्धा और वीर होने के कारण उन्हें हर बार विफल कर देते। तब किसी ने मंडोवर के राजा को एक गुप्त बात बताई।

उसने कहा, “राजन, क्या आपको पता है कि जयमल सिंह जी का एक नियम है? वे प्रतिदिन चार घंटे ठाकुर जी की सेवा में लीन रहते हैं, और इस समय में उन्हें कोई भी बाधित नहीं कर सकता।” इस भेद का पता चलते ही,मंडोवर के राजा ने एक विशाल सेना संगठित की और श्री जयमल सिंह जी की पूजा के समय मेड़ता नगर को चारों ओर से घेर लिया।

नगर के मंत्री, महामंत्री, और सेनापति सभी चिंता में दौड़ने लगे कि इस संकट की घड़ी में क्या उपाय किया जाए। सभी बोले, “यह तो वही समय है जब श्री जैमल सिंह जी ठाकुर जी की भक्ति में लीन हैं; हमें उनके भजन में विघ्न डालने का साहस नहीं है।” तब सबने जाकर राजमाता से निवेदन किया कि संकट को हल करने का कोई मार्ग सुझाएं, क्योंकि राजमाता को ही यह अधिकार था कि वे जयमल सिंह जी की साधना में प्रवेश कर उनसे बात कर सकती थीं।

राजमाता ने स्थिति को समझते हुए कहा, “ठहरो, मैं स्वयं जाकर उनसे बात करती हूँ।” इसके बाद वे सीधे मंदिर की ओर बढ़ीं, जहाँ श्री जयमल सिंह जी गहन साधना में लीन थे। सारी बात सुनने के बाद, श्री जयमल सिंह जी ने केवल इतना ही कहा, “भगवान की इच्छा सर्वोपरि है। वे ही सब भला करेंगे।” इतना कहकर वे शांतिपूर्वक ठाकुर जी की सेवा में लीन रहे, जैसे उनके हृदय में कोई चिंता या भय न हो।

श्यामवर्ण श्रीराम का पीताम्बर और आभूषणों से सुसज्जित होकर वीर रूप में जयमल जी के प्रिय घोड़े पर सवार होने का दिव्य दृश्य।

जब प्रभु श्रीराम ने स्वयं रणभूमि में कवच धारण कर शत्रु सेना को हराया

जैसे ही श्री जयमल सिंह जी की विनम्र वाणी ठाकुर जी तक पहुँची, उनकी करूणा का सागर उमड़ पड़ा। इतने मेंही श्यामवर्ण के प्रभु श्रीराम, पीली पीतांबरी धारण किए, गले में सुंदर वज्रंती माला और आभूषणों से सुसज्जित, सिर पर मुकुट और एक वीर योद्धा की तरह कवच धारण किए हुए प्रकट हुए। कंधे पर धनुष-बाण लिए, प्रभु श्रीराम ने तुरंत श्री जयमल जी के प्रिय अश्व का चयन किया – वही अश्व जिस पर बैठकर जैमल जी युद्ध के लिए जाया करते थे। भगवान उस घोड़े पर सवार होकर राजमहल की छत पर पहुँच गए और वहां से चारों ओर दृष्टि घुमाई।

इसके बाद प्रभु श्रीराम ने उस छत से रणभूमि में एक तेजस्वी छलांग लगाई। उनका दिव्य स्वरूप, उनकी अनुपम छटा और चेहरे पर तेज देख, शत्रु सेना सम्मोहित हो उठी। प्रभु ने बिना एक भी बाण चलाए, मात्र अपनी उपस्थिति और उनकी आभा से ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया कि शत्रु सेना जैसे सुषुप्त अवस्था में ढल गई। श्रीराम के दिव्य सौंदर्य, उनकी दृष्टि के कटाक्ष, और उनके अंगों से उठती सुगंध ने सेना को ऐसी मुग्धावस्था में डाल दिया कि सभी सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़कर भूमि पर गिर पड़े।

इस प्रकार, प्रभु श्रीराम ने क्षण मात्र में समस्त शत्रु सेना को निष्क्रिय कर दिया। रणभूमि को शांति प्रदान कर वे पुनः महल में लौट आए, अश्व को मुक्त किया, और अपने मंदिर में वापस जाकर व्यवस्थित हो गए।

राजा जयमल जी नए घोड़े पर सेना के साथ निकलते हुए और सामने के अद्भुत दृश्य को देखकर चकित होते हुए।

रणभूमि में ठाकुर जी के दर्शन से शत्रु बना भक्त

जैसे ही श्री जयमल जी के चार घंटे की साधना पूर्ण हुई, उन्होंने ठाकुर जी को प्रणाम किया और तुरंत रणभूमि में जाने का आदेश दिया। उनकी आज्ञा मिलते ही मंत्री, महामंत्री, सेनापति सभी तत्पर हो गए, और पूरी सेना को एकत्रित करने की तैयारी होने लगी। श्री जयमल जी ने अपने कवच धारण किए, सिर पर मुकुट सजाया, और अपने प्रिय अस्त्र-शस्त्र हाथ में लिए। फिर उन्होंने कहा, “मेरा अश्व लाओ।”

जैसे ही उनका प्रिय घोड़ा लाया गया, वे चकित रह गए। उस घोड़े से अद्भुत दिव्य सुगंध आ रही थी, उसका शरीर पसीने से तर था, मुँह से झाग निकल रहे थे, और उसकी साँसें तेज चल रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो घोड़ा अभी-अभी युद्ध से लौटकर आया हो। श्री जयमल जी ने हैरानी से पूछा, “यह घोड़ा थका हुआ क्यों है? इसकी देह पर मिट्टी के निशान हैं और यह शिथिल पड़ा है, जैसे किसी ने इस पर कठिन यात्रा की हो।”

कुछ पल इस अद्भुत घटना पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा, “अब देर नहीं करनी है। दूसरा घोड़ा लाओ।” वे नए घोड़े पर सवार होकर अपनी सेना के साथ मुख्य द्वार से बाहर निकले, तो सामने का दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए। रणभूमि में जितनी शत्रु सेना एकत्रित थी, वह सभी गहरी निद्रा में पड़ी थी; उनके अस्त्र-शस्त्र बिखरे हुए थे, मानो सभी किसी दिव्य निद्रा में ढल गए हों।

जयमल जी ने अपने सैनिकों को भेजा और कहा, “जाकर देखो क्या स्थिति है।” सैनिकों ने जाकर देखा और लौटकर बोले, “महाराज, यह अद्भुत चमत्कार है! शत्रु सेना में किसी को भी बाण या तलवार की चोट नहीं लगी है। सबके प्राण सुरक्षित हैं, उनकी श्वास चल रही है, लेकिन वे सभी गहरी निद्रा में हैं, सुषुप्त अवस्था में पड़े हैं।”

जयमल जी ने कहा, “वह राजा कहाँ है जो हमारे नगर पर आक्रमण करने आया था?” सैनिकों ने बताया कि वह भी अपने रथ में निद्रित पड़ा है। जयमल जी तुरंत वहाँ पहुँचे और उसके ऊपर जल का छिड़काव किया। जब वह राजा होश में आया, तो जयमल जी ने उससे पूछा, “यह सब तुमने क्या किया? अपनी सेना लेकर यहाँ आए, लेकिन आक्रमण क्यों नहीं किया? और अब तुम्हारी सेना इस प्रकार सोई क्यों पड़ी है?”

होश में आते ही वह राजा काँपते हुए बोला, “हे जयमल जी, आज मैं आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ। मेरी एक अंतिम इच्छा पूरी कर दीजिए।” जयमल जी ने कहा, “भाई, हुआ क्या?”

राजा ने काँपते हुए कहा, “आपके नगर से ही एक सांवला योद्धा, सोलह वर्षीय, घुँघराले बालों वाला, दीर्घ नेत्रों से दमकता, किले की छत से अश्व पर सवार होकर उतरा। उसके कंधे पर धनुष और बाण सजे हुए थे। उसने रणभूमि में बाण तो कम चलाए, पर उसकी तिरछी चितवन, मंद मुस्कान, और दिव्य तेज ने हम सबको घायल कर दिया। मेरे प्राण उस सांवले योद्धा के दर्शन में अटके हुए हैं। बस, मुझे एक बार उसका दर्शन करवा दीजिए, मैं आपके चरणों में हूँ।”

जयमल जी ने यह सुना और तुरंत समझ गए कि यह कोई और नहीं, स्वयं ठाकुर जी थे, जिन्होंने उनकी रक्षा के लिए लीला रचाई थी। भावविभोर होकर वे उस राजा के सामने बोले, “तू सचमुच सौभाग्यशाली है, तू मेरा शत्रु नहीं रहा। तुझे मेरे आराध्य, प्रभु श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए। वो दिव्य रूप मुझे कभी न मिल सका, और तुझे अपने आँखों से दर्शन हो गए!”

उस राजा के मन की शत्रुता जाती रही। वह बार-बार जयमल जी के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगा, “मुझे एक बार फिर उस दिव्य योद्धा के दर्शन करा दो, मैं धन्य हो जाऊँ।” जयमल जी की आँखों में आँसू थे, वे समझ गए कि यह ठाकुर जी का प्रेम था, जो उनकी रक्षा में उतर आया था। उस दिन से वह राजा शत्रु नहीं, बल्कि जयमल जी का भक्त बन गया और उनकी सेवा में सदा के लिए समर्पित हो गया।

श्री ठाकुरजी शैय्या पर विराजमान, पान-तांबूल का आस्वाद लेते हुए आराम से विश्राम करते हुए।

राजा जयमलजी की रानी को बालरूप में श्री रघुलालजी के दर्शन

राजा जयमल जी का अपने आराध्य ठाकुरजी के प्रति अपार प्रेम और भक्ति थी। एक गर्मी के दिन, अपने शीतल और सुविधाजनक कक्ष में विश्राम करते हुए उन्होंने सोचा कि यदि यहाँ ख़स की तटिया, हवादार कमरा, और गीले पर्दों के बावजूद गर्मी महसूस हो रही है, तो नीचे स्थित मंदिर में ठाकुरजी को कितनी अधिक असुविधा होती होगी।

इस विचार से प्रेरित होकर राजा ने अपने निवास के छत पर एक हवादार, सुंदर कक्ष का निर्माण करवाया। इस कक्ष में भगवत लीलाओं के अनेक सुंदर चित्र अंकित करवाए गए थे। वहां कोमल शैया, रेशमी वस्त्र, सोने के पानदान, चंवर और अन्य सेवा-सामग्री सजाई गई थी।

कक्ष तक पहुंचने के लिए एक लकड़ी की सीढ़ी (नसेनी) का प्रबंध किया गया था। राजा स्वयं रात को वहां जाकर पुष्पों से शैया सजाते, शयन भोग, इत्र, जल, पान-तांबूल, और अन्य आवश्यक वस्तुएँ यथास्थान रखते और फिर नीचे आकर सीढ़ी हटा देते। यह सुनिश्चित किया गया कि उनकी अनुपस्थिति में वहां कोई और प्रवेश न करे।

नीचे आने के बाद राजा थोड़ी दूरी पर बैठकर मानसी सेवा में लीन हो जाते। उनके ध्यान में ठाकुरजी का दिव्य स्वरूप रहता—श्री ठाकुरजी शैया पर सुशोभित हैं, पान-तांबूल का आनंद ले रहे हैं, और सुखपूर्वक शयन कर रहे हैं। यह सेवा राजा की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी।

राजा के इस रहस्य से रानी पूरी तरह अनजान थीं। वह सोचती थीं कि राजा तो नित्य 10 घड़ी (4 घंटे) ठाकुरजी की सेवा-पूजा करते हैं, लेकिन इसके बाद छत पर जाकर क्या करते हैं? लेकिन एक रात, जिज्ञासावश रानी ने सीढ़ी लगाई और कक्ष में झांका। परदा थोड़ा हटाकर झांकते ही वह स्तब्ध रह गई। उसने देखा कि शैया पर एक सुंदर सुकुमार किशोर स्वरूप, अत्यंत दिव्यता के साथ विश्राम कर रहे हैं। यह दृश्य देखकर रानी का मन आनन्द और श्रद्धा से भर गया।

रानी बिना कोई व्यवधान डाले चुपचाप नीचे उतर आई और सीढ़ी को वापस अपनी जगह रख दिया। सुबह होते ही उसने राजा को यह अनुभव सुनाया। राजा ने रानी को डांटते हुए कहा कि ऐसी गलती फिर कभी न हो, क्योंकि इससे ठाकुरजी की शांति भंग हो सकती है। लेकिन भीतर ही भीतर राजा प्रसन्न थे कि उनकी रानी को श्री ठाकुरजी के अद्वितीय दर्शन प्राप्त हुए।